🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू सभा संत की, सुमति उपजै आइ ।*
*शाक्त की सभा बैसतां, ज्ञान काया तैं जाइ ॥*
===================
*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
.
*सुमति कुमति का अंग १०४*
इस अंग में सुबुद्धि और कुबुद्धि संबंधी विचार कर रहे हैं ~
.
रज्जब मन माया सब ठौर है, सुमति कुमति का फेर ।
वह पहुँचावे स्वर्ग को, वहिं नरक न जाता बेर ॥१॥
मन और माया तो सभी स्थानों में है किन्तु सुबुद्धि और कुबुद्धि का भेद है । सुबुद्धि स्वर्ग में पहुंचाती है और उस कुबुद्धि में नरक में जाते कोई देर नहीं लगती ।
.
सुमित पंथ सो स्वर्ग का, उत्तम ऊंचे जाँहि ।
दुर्मति मारग दुर्मती, रज्जब नरक समाहिं ॥२॥
सुमति है सो तो स्वर्ग का मार्ग है, उत्तम पुरुष ही उस मार्ग से ऊंचे लोकों में जाते हैं और दुर्बुद्धि प्राणी दुर्मति रूप मार्ग से नरक में पड़ते हैं ।
.
दुर्मति दिल दीरध दुखी, सुमति सदा सुख राशि ।
जन रज्जब जोयर१ कही, देखो सकल विमाशि२ ॥३॥
दुर्बुद्धि मानव का हृदय बड़ा दुखी रहता है और सुबुद्धि वाले का हृदय सदा सुख राशि में निमग्न रहता है । यह मैंने देख१ करके ही कहा जाता है, तुम सब भी विमर्शन२(विचार) करके देख सकते हो ।
.
कुमति कुकर्म हुं कंद१ है, सुमति सुकृत हुं मूल२ ।
जन रज्जब जानी जड़ी३, उभय एक अस्थूल४ ॥४॥
कुबुद्धि कुकर्म की जड़१ है और सुबुद्धि शुभ कर्मों की जड़२ है । यह हमने जान लिया है कि कुमति-सुमति दोनों एक ही स्थूल४ शरीर के भूषण नग के समान जटित३ हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें