शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*दादू जल दल राम का, हम लेवैं परसाद ।*
*संसार का समझैं नहीं, अविगत भाव अगाध ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विश्‍वास का अंग)*
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साभार ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु,* *सेवा*
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संत रसिक मुरारीजी महान साधुसेवी थे । एक दिन उनके यहां विशेषरूप से कोई भण्डारा था । बहुत बड़ी पंक्ति लगी थी । एक साधु ने अपने सोटे का पारस(पत्तल) मांगा । परोसने वाले ने नहीं दिया । तब उसे साधु ने अपनी आधी जीमी हुई जूठी पत्तल उठाकर रसिक मुरारी के सर में मारी । उस समय रसिक मुरारीजी के शिष्य बारहराजा भी उसी पंक्ति में थे वे लोग उस पर साधु को मनाने के लिये उठे तब रसिक मुरारी जी ने उनको तो बैठा दिया और स्वंय ही उठकर बड़ी नम्रता के साथ उस साधु से बोले - "भगवन् ! और दिन तो आपका चरणामृत ही मिलता था ।(रसिक मुरारीजी सब साधुओं के चरण धोकर चरणामृत लिया करते थे) किन्तु आज तो आपने बड़ी कृपा की जो भी प्रसाद भी दिया है ।" यह कह कर उस साधु को कई पारस दिलाये । इससे सूचित होता है कि साधुसेवी में महान् नम्रता होती है ।
साधुसेवि में नम्रता, महान देखी जाय ।
रसिकमुरारी ने करी, पत्तल सिर पर खाय ॥३५०॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^^

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