शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग रामकली ८ (गायन समय प्रभात ३ से ६)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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१९२ - करणी बिना कथनी । प्रतिताल
बातैं बाद जाहिंगी भइये, 
तुम जनि१ जानो बातनि पइये ॥टेक॥
जब लग अपना आप न जानैं, 
जब लग कथनी काची ।
आपा जान साँई को जानैं, 
तब कथनी सब साची ॥१॥
करनी बिना कंत नहिं पावै, 
कहै सुनै का होई ।
जैसी कहै करै जे तैसी, 
पावैगा जन सोई ॥२॥
बातनि ही जे निर्मल होवै, 
तो काहे को कस लीजै ।
सोना अग्नि दहे दस बारा, 
तब यहु प्रान पतीजै ॥३॥
यों हम जाना मन पतियाना, 
करनी कठिन अपारा ।
दादू तन का आपा जारे, 
तो तिरत न लागै बारा ॥४॥
कर्त्तव्य रहित कथन का परिचय दे रहे हैं - भाइयो ! केवल बातों द्वारा तो आयु व्यर्थ ही चली जायगी । तुम मत१ समझो कि बातों से ही हमें प्रभु मिल जायेंगे । 
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जब तक अपने आप को नहीं जानोगे, तब तक परमार्थ का कथन व्यर्थ ही है । आत्मस्वरूप जान कर प्रभु को पहचानोगे तब ही परमार्थ सम्बन्धी सब कथन सच्चा माना जायगा । 
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कर्त्तव्य के बिना प्रभु प्राप्त नहीं होते, केवल कहने सुनने से ही क्या होता है ? जैसी प्रभु सँबँधी बातें कहता है, वैसा ही करता है, वही प्रभु को प्राप्त करेगा । 
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यदि बातों से ही हृदय निर्मल हो जाय तो साधक जन साधन कष्ट क्यों सहन करें ? सदोष सुवर्ण को अग्नि में दस बार जलाया जाता है, तब ही प्राणी को उसके शुद्ध होने का विश्वास होता है । 
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इस प्रकार ही हमने परमात्मा को जाना है, तब ही हमारे मन को विश्वास हुआ है । कर्त्तव्य करना अति कठिन है । यदि तन का अहँकार जला दें तो सँसार - सिन्धु को तैर कर पार करने में कुछ भी देर नहीं लगती ।
(क्रमशः)

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