बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

*२०. व्रत-बन्ध*

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*तुम ही आदि अंत पुनि तुम ही,*
*तुम कर्ता त्रय लोक मंझार ।*
*कुछ नांही तैं कहा होत है,*
*दादू बलि पावे दीदार ॥*
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*२०. व्रत-बन्ध*
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जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते।
वेदपाठी भवेद् विप्रः ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः॥[१]
([१] जन्मकाल में बालक शूद्रतुल्य ही होता है। संस्कार होने से उनकी द्विजसंज्ञा होती है? जो निरन्तर वेदों का ही अध्ययन-अध्यापन करते-कराते रहते हैं इससे वे विप्र कहाते हैं और जिसे ब्रह्म का साक्षात्कार हो गया वही असल में ब्राह्मण है। धर्मशास्त्र)
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संस्कार ही जीवन-पथ के परिचायक चिह्न हैं। जैसे संस्कार होंगे उन्हीं के अनुसार जीवन आगे बढ़ेगा। संयम और नियम ही उन्नति के साधन हैं। पूज्यपाद महर्षियों ने संयम के ही सिद्धान्तों पर वर्णाश्रम-धर्म का प्रसार किया और उनके लिये पृथक-पृथक विधान बनाये।
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द्विजातियों के लिये १६ संस्कारों की आज्ञा दी। गर्भाधान से लेकर मृत्यु अथवा संन्यास-पर्यन्त सभी संस्कारों की एक विशेष विधि का निर्माण किया। जिनसे चित्त पर प्रभाव पड़े और भविष्य-जीवन उज्ज्वल बन सके। द्विजातियों का वेदारम्भ और उपवीत-संस्कार यही प्रधान संस्कार समझा जाता है।
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असल में यज्ञोपवीत-संस्कार होने पर ही बालक के ऊपर वैदिक कर्म लागू होते हैं, इसीलिये इसे व्रत-बन्ध-संस्कार भी कहते हैं। पूर्वकाल में बच्चा जब पढ़ने के योग्य हो जाता था, तो उसे सद्गुरु के आश्रम में ले जाते थे, गुरु उसे ग्रहण करके शौच, आचार और वेद की शिक्षा देते थे। बस, इसी को उपनयन-संस्कार कहते थे।
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विद्या समाप्त होने पर गुरु की आज्ञा से शिष्य जब घर को लौटता था, तो उसे समावर्तन-संस्कार कहते थे। ये तीनों संस्कार आज भी नाममात्र को होते तो हैं, किन्तु इन तीनों का अभिनय एक ही दिन में करा दिया जाता है। यह विकृत संस्कार आज भी हमारी महत्ता का स्मरण दिलाता है। आज निमाई का यज्ञोपवीत-संस्कार होगा।
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घर में विवाह-शादी की तरह तैयारियाँ हो रही हैं, मिश्र जी ने अपनी शक्ति के अनुसार इस संस्कार को खूब धूमधाम से करने का निश्चय किया है। घर के आँगन में एक मण्डप बनाया गया है। उसमें एक ओर विद्वान ब्राह्मण बैठे हुए हैं, उनके पीछे मिश्र जी के सम्बन्धी और स्नेही बैठे हैं। सामने स्त्रियाँ बैठी हैं, जो भाँति-भाँति के मंगलगीत गा रही हैं। द्वार पर बाजे बज रहे हैं, चारों ओर खूब चहल-पहल दिखायी पड़ती है।
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ग्रहपूजा और हवनादि का कार्य कराने के निमित्त आचार्य सुदर्शन और विष्णु पण्डित प्रभृति विद्वान मिश्रजी के पास मण्डप में बैठे हुए हैं। यथासमय क्षौर कराकर निमाई मण्डप में बुलाये गये। उनका सिर घुटा हुआ था, आचार्य ने उन्हें अपने हाथों से ब्रह्मचारियों के- से पीत वस्त्र पहनाये। पीले वस्त्र की लंगोटी पहनायी, ओढ़ने को मृगचर्म दिया और हाथ में बड़ा-सा एक पलास का दण्ड दिया। अब निमाई पूरे ब्रह्मचारी बन गये। गौर वर्ण के उज्ज्वल शरीर पर पीत वस्त्र बड़े ही भले मालूम पड़ते थे। पिता के पास बैठकर इन्होंने समिधाधान किया, अग्नि में आहुति दी और यज्ञोपवीत धारण किया।
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मिश्र जी ने एक वस्त्र की आड़ करके इनके कान में वेदमाता सावित्री अथवा गायत्री-मन्त्र का उपदेश दिया। मन्त्र के श्रवण मात्र से ये भाव में निमग्न हो गये। मन्त्र सुनते ही इन्होंने एक बड़े जोर की हुंकार मारी और साथ ही अचेत होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। हाथ का दण्ड एक ओर पड़ा था और ये अचेत होकर पृथ्वी पर दूसरी ओर पड़े थे।
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दोनों नेत्रों से अश्रुओं की धारा बह रही थी, प्राणवायु बहुत धीरे-धीरे चल रहा था। यज्ञ के धूम्र लगने से लाल-लाल आँखें आधी खुली हुई थीं और ये संज्ञा शून्य हुए चुपचाप पृथ्वी पर पड़े थे। इनकी ऐसी अवस्था देखकर सभी घबड़ा गये। मिश्र जी ने इनके मुँह में जल डाला। कई आदमी पंखे से हवा करने लगे। धीरे-धीरे इनकी मूर्च्छा भंग हुई और ये कुछ काल में सचेत हो गये।
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सभी को इनकी इस अवस्था से महान आश्चर्य हुआ। सचेत होने पर इन्होंने पिता जी से कहा- ‘पिता जी ! अब मुझे क्या करना चाहिये?’ ब्रह्मचर्य-व्रत लेने पर छात्र को गुरु-गृह में रहकर भिक्षा पर ही निर्वाह करना होता था, यज्ञोपवीत के समय आज भी एक दिन के लिये भिक्षा का अभिनय कराया जाता है। इसीलिये अब निमाई को भिक्षा माँगने के लिये झोली दी गयी। निमाई के हृदय पर उस संस्कार का बड़ा ही गहरा प्रभाव पड़ा था।
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इन कृत्यों के कारण इनकी कायापलट-सी हो गयी। मुख पर एक अपूर्व ज्योति दृष्टिगोचर होने लगी। मुँड़ा हुआ माथा सूर्य के प्रकाश में दमकने लगा। एक हाथ में दण्ड लिये और दूसरे में झोली लटकाये ब्रह्मचारी के वेश में निमाई बड़े ही भले मालूम पड़ते थे। मानो वामन भगवान अपने भक्त बलि से भिक्षा माँगने जा रहे हों। ये पहले अपनी माता के पास भिक्षा माँगने गये, फिर बारी-बारी से सभी के पास भिक्षा माँगने लगे।
(क्रमशः)

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