बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

*१९. निमाई का अध्ययन के लिये आग्रह*

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*देखत नैन संतोष भयो है, इहै तुम्हारो ख्याल ॥*
*दादू जन सौं हिल-मिल रहिबो, तुम हो दीन दयाल ॥*
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१९. निमाई का अध्ययन के लिये आग्रह*
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जब ये घर पर रहते और कोई चीज बेचने वाला उधर आता तो माता से बार-बार आग्रह करते हमें अमुक चीज दिला दो। मिठाई वाला आता तो मिठाई लेने को कहते, फलवाला आता तो फलों के लिये आग्रह करते। चाट बिकने आती तो चाट ही खाने को माँगते। न दिलाने पर खूब जोरों से रोते और जब तक उसे पा नहीं लेते तब तक बराबर रोते ही रहते। चीज मिलने पर उसमें से थोड़ी-सी खा लेते, शेष को वैसे ही छोड़ देते।
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माता बार-बार प्यार से समझाती- ‘बेटा ! तू जानता नहीं, तेरे पिता निर्धन हैं, उनके पास इतने पैसे कहाँ से आये। तू दिनभर भाँति-भाँति की चीजों के लिये रोया करता है, जो भी बिकने आता है उसी के लिये आग्रह करने लगता है। इतने पैसे मैं कहाँ से लाऊँ?’ आप कहते- ‘हमें पढ़ने न दोगी तो हम ऐसा ही करेंगे। जब पढ़ेंगे नहीं तो यही करते रहेंगे। हमें इससे क्या मतलब, या तो हमें पढ़ने दो नहीं तो हम ऐसे ही माँगा करेंगे।’
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इनकी ऐसी बातें सुनकर माता सोचती, इससे तो इसे पढ़ने ही दिया जाय तो अच्छा है, किन्तु विश्वरूप का स्मरण आते ही वह डर जाती और फिर उसे मिश्र जी के सामने ऐसा प्रस्ताव करने का साहस न होता। ये और भी अधिकाधिक चंचल होते जाते। एक दिन आपने गुस्से में आकर घर में से बहुत-से मिट्टी के बर्तन निकाल-निकालकर आँगन में फोड़ दिये और आप पास के ही एक धूरे पर जा बैठे। वहाँ उसी प्रकार अशुद्ध हाँड़ियों को अपनी भुजाओं में पहन लिया। टूटी-फूटी टोकरी को सिर पर रख लिया और खपड़े घिस-घिसकर उससे शरीर को मलने लगे।
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माता बार-बार मने करतीं, किन्तु ये सुनते ही न थे, वहीं बैठकर चुपचाप फूटी हाँडि़यों को बजाने लगे। बहुत-सी पास-पड़ोस की स्त्रियाँ भी आ गयीं। गंगास्नान करने वाले खड़े हो गये। माता इन्हें बार-बार धिक्कार देते हुए ऐसे अपवित्र कार्य को करने से मना करतीं। ये कहते- ‘मूर्ख बेटे से तुम और आशा ही क्या रखी सकती हो? जब तुम हमें पढ़ाओगी नहीं तो हम ऐसा ही काम करेंगे। मूर्ख आदमी शुचि-अशुचि क्या जाने? इसका ज्ञान तो विद्या पढ़कर ही होता है।’
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पास में खड़ी हुई स्त्रियाँ शचीमाता को उलाहना देते हुए कहतीं- ‘बालक कह तो ठीक रहा है। तुम इसे पढ़ने क्यों नहीं देती? यह तो बड़े भाग्य की बात है कि बच्चा पढ़ने के लिये इतना आग्रह कर रहा है। हमारे बच्चे तो मारने-पीटने पर भी पढ़ने नहीं जाते। इसे पढ़ने के लिये जरूर भेजा करो।’ पास में खडे़ हुए और भी लोग बच्चे की बात का समर्थन करने लगे।
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सबके समझाने से माता का भी भाव परिवर्तित हो गया। उन्होंने प्यार के साथ कहा- ‘अच्छा, कल से पढ़ा करना, मैं तेरे पिता से कह दूँगी। अब आकर जल्दी से स्नान कर ले।’ अतना सुनते ही ये जल्दी से उठकर चले आये और माता के कथनानुसार शीघ्र ही गंगास्नान करके घर लौट आये। शची देवी ने पण्डित जी से बहुत आग्रह किया कि बच्चे को पढ़ने देना चाहिये। सभी पढ़े-लिखे संन्यासी थोड़े ही हो जाते हैं। नवद्वीप में हजारों पण्डित हैं, इतने विद्यार्थी हैं, इनमें से कोई भी संन्यासी नहीं हुआ। यह तो भाग्य की बात है। यदि इसके भाग्य में संन्यास ही होगा तो हम उसे रोक थोडे़ ही सकते हैं। ब्राह्मण का बालक मूर्ख ठीक नहीं होता। और भी बहुत-से लोगों ने पण्डित जी से आग्रह किया।
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सब लोगों के कहने से पण्डित जी ने पढ़ने की सम्मति दे दी। निमाई खूब मनोयोग के साथ पढ़ने-लिखने लगे। अब इन्होंने सभी प्रकार की चंचलता छोड़ दी। एक दिन इन्होंने नैवेद्य का पान खा लिया। उसे खाते ही ये बेहोश हो गये। थोड़ी देर में होश आने पर इन्होंने माता से कहा- ‘अम्मा ! भैया विश्वरूप मेरे पास आये थे, उन्होंने कहा- ‘तुम भी संन्यासी हो जाओ’ हमने कहा- ‘हम बालक हैं, भला हम संन्यास का मर्म क्या समझें। हम तो अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा ही करेंगे। यही हमारा धर्म है, हम अपने माता-पिता को छोड़कर कहीं जाना नहीं चाहते।’
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मेरी बात सुनकर उन्होंने कहा- ‘अच्छा, तो ठीक है, माता जी के चरणों में हमारा प्रणाम कहना। अब हम जाते हैं।’ यह कहकर वे चले गये। इस बात को सुनकर माता को विश्वरूप की याद आ गयी। उनकी आँखों में से अश्रुओं की धार बहने लगी। उन्होंने अपने प्यारे निमाई को छाती से चिपका लिया। उनका मातृस्नेह उमड़ पड़ा और रूँधे हुए कण्ठ से रोते-रोते उन्होंने कहा- ‘बेटा निमाई ! अब हमें तेरा ही एकमात्र सहारा है, हम वृद्ध अन्धों की तू ही एकमात्र लकड़ी है। हमारी सब आशाएँ तेरे ही ऊपर हैं। तू हमें विश्वरूप की तरह धोखा मत देना।’
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निमाई बहुत देर तक माता की गोद में चिपके रहे, उन्हें माता की शीतल सुखदायी गोदी में परम शान्ति मिल रही थी, माता भी एक अनिर्वचनीय आनन्द का अनुभव कर रही थी। इस प्रकार निमाई की अवस्था ९ वर्ष की हो गयी। शरीर इनका नीरोग, पुष्ट और सुगठित था, देखने में ये १६ वर्ष के-से युवक जान पड़ते थे। अब पिता ने इनके यज्ञोपवीत की तैयारियाँ कीं।
(क्रमशः)

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