शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2020

निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग ७६/७९

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । 
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ 
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी 
(श्री दादूवाणी ~ ८. निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग) 
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*दादू टीका राम को, दूसर दीजे नांहि ।*
*ज्ञान ध्यान तप भेष पक्ष, सब आये उस मांहि ॥७६॥*
ज्ञान ध्यान तप सन्यास से जो फल मिलता है, वह सब भगवान् राम की उपासना से प्राप्त हो जाता है । राम शब्द से ब्रह्म का बोध समझना । नाम भेद से अर्थ में भेद नहीं हुआ करता है । जैसे घट कलश इनमें वर्णभेद होने पर भी कोई भेद नहीं है । पुराण में लिखा है कि-राम इन्द्र, कृष्ण, हरि, शम्भु, शिव, यह सब शब्द ब्रह्म का ही बोध कराते हैं । जैसे घट और कलश इन में जरा सा भी अर्थ में भेद नहीं है । ब्रह्म, शंकर, इन्द्र, आत्मा तथा चराचर जगत् इन सब के अवसान की सीमा विश्वेश आप ही हैं । क्योंकि सारे वेद वेदांग सारे जगत् का कारण आपको ही बतलाते हैं । अतः ब्रह्म की उपासना ही श्रेष्ठ उपासना है ।
*साधू राखै राम को, संसारी माया ।*
*संसारी पल्लव गहै, मूल साधू पाया ॥७७॥*
भक्त तथा संसारी पुरुषों में बहुत भेद है । भक्त तो भगवान् को भजते हुए अपने हृदय में भगवान् को धारण करते हैं । संसारी पुरुष कामनाओं से प्रेरित होकर नाना देवी-देवताओं की उपासना और माया का ही चिन्तन करते हैं इससे वे माया को धारण करने से जन्म मरण रूपी चक्र में पड़ते रहते हैं और भक्त संसार से मुक्त हो जाते हैं ।
*॥आन लगनि विभचार॥* 
*दादू जे कुछ कीजिये, अविगत बिन आराध ।*
*कहबा सुनबा देखबा, करबा सब अपराध ॥७८॥*
*सब चतुराई देखिए, जे कुछ कीजै आन ।* 
*दादू आपा सौंपि सब, पीव को लेहु पिछान ॥७९॥*
मनुष्य जो जो भी कर्म करता है, सुनता बोलता देखता है वह सब अपराध ही है, जो कुछ चतुराई है वह भी बन्धन का कारण होने से दुःख रूप ही है । अतः सब कुछ परमात्मा को समर्पण करके उसका भजन ही करना चाहिये । लिखा है कि वही कर्म अच्छा है जिससे भगवान् प्रसन्न हो । विद्या भी वही है जिससे भगवान् का ज्ञान प्राप्त हो । भागवत में लिखा है- 
जो भगवान् के पराक्रम की गाथाओं को कान से नहीं सुनता उसके कान सर्पों के रहने के लिये बिल के समान हैं । जिसकी जिव्हा भगवान् के गुणों को नहीं गाती तो वह मैंढक की जीभ की तरह व्यर्थ बकवाद करनी वाली है । जो मस्तक भगवान् के चरण कमलों में नमस्कार नहीं करता, वह उसके शरीर पर बोझा ही है । चाहे कितने ही भूषण धारण कर रखे हों । जो हाथ भगवान् की सेवा न करते हों तो वे चाहे कितनें सुवर्ण भूषणों से युक्त क्यों नहीं हों, परन्तु वे मुर्दे के हाथ की तरह होते हैं, नेत्रों से जिन्होंने भगवान् की मूर्ति के दर्शन नहीं किये, वह नेत्र मोर के चंदवे की तरह देखने मात्र के लिये ही है । जो पैरों से चल कर भगवान के मन्दिर में नहीं जाता तो उसके पैर, पेड की तरह ही है । जिस का हृदय भगवान् के नामों का उच्चारण करते हुए प्रफुल्लित नहीं होता । शरीर में रोमावली हर्षित नहीं होती नेत्रों में अश्रु धारा नहीं बहे तो वह हृदय पत्थर की तरह कठोर ही है । अतः परमात्मा को जानने में ही जन्म की सार्थकता है ।
(क्रमशः)

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