गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

*माया का अंग १०७*(५/८)* =

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*दादू माया कारण जग मरै, पीव के कारण कोइ ।*
*देखो ज्यों जग परजलै, निमष न न्यारा होइ ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ Mahant Ram Gopal Das Tapasvi
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*माया का अंग १०७*
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रज्जब माया मिलत दुख, बिछुरत विहरै प्राण ।
करवत रेती सांण के, आवण जाणे जाण ॥५॥
जैसे करवत, रैती और शाण के आने जाने पर वस्तु कटती है वैसे ही माया के आकर मिलने से भी दुख होता है और बिछुङते समय भी प्राणी के हृदय को विवीर्ण करती है, ऐसा ही जानो ।
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बणि अनार वित आये फाटै, नीर गये पर फाटे ताल ।
त्यों रज्जब संपत्ति विपत्ति,मन को करे विहाल ॥६॥
कपास तथा अनार फल रूप धन आने से फटते हैं और जल के सूखने पर तालाब फटता है, वैसे ही माया का आना रूप संपत्ति और जाना रूप विपत्ति दोनों ही मन को व्यथित करती है ।
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रज्जब ऋद्धि बाहिली रमत ही, जीव मांहिला जाय ।
तो मन माया मीन जल, नर देखो निरताय ॥७॥
बाहर की माया जाते ही भीतर का मन भी जाता है, तब हे नरों ! विचार करके देखो, जैसे जल बिना मच्छी नहीं रह सकती, वैसे ही माया बिना मन नहीं रह सकता ।
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रज्जब राचै हि ऋद्धि सौं, मिल हिं मानवी आय ।
विरचै सोई विभूति बिन, जब शक्ति सदन सौं जाय ॥८॥
माया होने से मनुष्य आकर मिलता है और प्रेम करता है । फिर जब माया घर से चली जाती है तब वही माया के बिना विरक्त हो जाता है अर्थात पूर्ववत प्रेम नहीं करता ।
(क्रमशः)

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