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*दादू सम कर देखिये, कुंजर कीट समान ।*
*दादू दुविधा दूर कर, तज आपा अभिमान ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ दया निर्वैरता का अंग)*
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साभार ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु,* *दया*
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शाहपुरा रामस्नेही शाखा के आचार्य श्री राम चरणजी कुछ संतों के साथ गलता(जयपुर) जा रहे थे । मार्ग में एक दिन रामचरणजी को रसोई बनाने में लगाया गया । रसोई बनाते समय जलती हुई लकड़ियों में चींटियों को देखकर रामचरणजी को बड़ा दु:ख हुआ । उसी समय लकड़ियां बुझाकर "अब आगे रसोई नहीं बनाऊँगा ।" यह नियम ले लिया और भिक्षा मांगकर खाने लगे ।
पर दुख दयालु न लख सके, तजे शीध्र तिहिं हेतु ।
तजी रसोई चींटि लख, रामचरण कर चेतु ॥१४३॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^^

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