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*जोगिया बैरागी बाबा,*
*रहै अकेला उनमनि लागा ॥*
*आतम जोगी धीरज कंथा,*
*निश्चल आसण आगम पंथा ॥*
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साभार ~ Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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१८. विश्वरूप का गृह-त्याग
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धन्याः खलु महात्मानो मुनयः सत्यसम्मताः।
जितात्मानो महाभागा येषां न स्तः प्रियाप्रिये॥[१]
([१] वे सत्य की उपासना करने वाले जितात्मा महाभाग महात्मा मुनिगण धन्य हैं, जिन्हें न तो किसी से अनुराग है और न किसी से द्वेष। जो सभी प्राणियों में समानभाव रखकर सभी को समदृष्टि से देखते हैं। श्रीवा. रा. सु. २६/४६)
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बन्धन का हेतु ममत्व है, ममत्व का सम्बन्ध मन से है। जिसने मन से ममत्व को निकाल दिया, वह तो नित्यमुक्त ही है। उसके लिये न कोई अपना है न पराया, वह तो अनेक रूपों में एक ही आत्मा को चारों ओर देखता है, फिर वह संकुचित सीमा में अपने को आबद्ध नहीं रख सकता। विश्वरूप ने निश्चय कर लिया कि मुझे इस गृह को त्याग देना चाहिये।
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जहाँ पर माता-पिता ही मुझे अपना समझते हैं, जहाँ नित्यप्रति भाँति-भाँति के संसारी प्रलोभनों के आने की सम्भावना है, ऐसी जगह अब अधिक दिन ठहरना ठीक नहीं है। ऐसा निश्चय कर लेने पर एक दिन इन्होंने अपनी माता को एक पुस्तक देते हुए कहा- ‘माँ, यह पुस्तक निमाई के लिये है, जब वह बड़ा हो तो इस पुस्तक को उसे दे देना, भूल मत जाना।’
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माता ने सरलता के साथ उत्तर दिया- ‘तब तक तू कहीं चला थोड़े ही जायगा। मैं भूल जाऊँ तो तू तो न भूलेगा। तू ही इसे अपने हाथ से उसे देना और पढ़ाना। तू भी तो अब पण्डित बन गया है। निमाई तुझसे ही पढ़ा करेगा।’ विश्वरूप ने मानसिक भावों को छिपाते हुए कहा- ‘हाँ, ठीक है, मैं रहा तो दे ही दूँगा, किन्तु तू भी इस बात को याद रखना।’
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भोली-भाली माता को क्या पता कि मेरा विश्वरूप अब दो ही चार दिन का मेहमान है। दो-चार दिन के बाद फिर इसकी मनमोहिनी सूरत हम लोगों को कभी भी देखने को न मिल सकेगी। माता अपने काम-धंधे में लग गयी। जाड़े का समय है, खूब कड़ाके का जाड़ा पड़ रहा है। सभी प्राणी जाडे़ के मारे गुड़मुड़ी मारे रात्रि में सो रहे हैं। चारों ओर नीरवता का साम्राज्य है, कहीं भी कोलाहल सुनायी नहीं पड़ता, सर्वत्र स्तब्धता छायी हुई है। ऐसे समय विश्वरूप को निद्रा कहाँ?
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वे तो भविष्य-जीवन को महान बनाने की ऊहापोह में लगे हुए हैं। घर में एक बार दृष्टि डाली। एक ओर माता सो रही है, उसके पास ही चुपचाप निमाई आँख बन्द किये हुए शयन कर रहे हैं। मिश्र जी दूसरी ओर रजाई ओढ़े खाट पर सो रहे हैं। .
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विश्वरूप ने एक बार खूब ध्यान से पिता की ओर देखा। सिर के बाल पके हुए थे, मुँह पर झुर्रियाँ पड़ी हुई थीं। हमेशा गृहस्थी की चिन्ता करते रहने से उनका स्वभाव ही चिन्तामय बन गया था, सोते समय भी मानो वे किसी गहरी चिन्ता में डूबे हुए हैं। निर्धन वृद्ध के चेहरे की ओर देखकर एक बार तो विश्वरूप अपने निश्चय से विचलित हुए।
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उनके मन में भाव आया- ‘पिता वृद्ध हैं, आजीविका का कोई निश्चित प्रबन्ध नहीं, निमाई अभी निरा बालक ही है, घर का काम कैसे चलेगा?’ किन्तु थोड़े ही देर बाद वे सोचने लगे- ‘अरे, मैं यह क्या सोच रहा हूँ? जिसने इस चराचर विश्व की रचना की है, जो सभी के भरण-पोषण का पहले से ही प्रबन्ध कर देता है, उसको कर्ता न मानकर मैं अपने में कर्तापने का आरोप क्यों कर रहा हूँ? वृत्ति तो सबकी वही चलता है। मनुष्य तो निमित्तमात्र है। विश्वम्भर ही सबका पालन करते हैं, मुझे अपने सत्संकल्प से विचलित न होना चाहिये’ यह सोचकर उन्होंने सोती हुई माता को मन-ही-मन प्रणाम किया।
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छोटे भाई को एक बार प्रेमपूर्वक देखा और धीरे से घर से निकल पड़े। संकेत के अनुसार लोकनाथ उन्हें गंगा तट पर तैयार बैठे मिले। दोनों एक-दूसरे को देखकर अत्यन्त ही प्रसन्न हुए, अब उन्हें यह चिन्ता हुई कि रात्रि में गंगा-पार किस प्रकार जा सकते हैं। अब बहुत ही शीघ्र प्रातःकाल होने वाला है। इधर-उधर कहीं जायँगे तो पहचाने जाने पर पकड़े जायँगे। इसलिये गंगा-पार जाये बिना क्षेम नहीं है। उस समय नाव का मिलना कठिन था। दोनों ही युवक निर्भीक थे, जीवन का मोह तो उन्हें था ही नहीं।
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मनुष्य इस जीवन-रक्षा के ही लिये साहस के काम करने से डरा करता है। जिसने जीवन की उपेक्षा कर दी है, जिसने अपने शीश को उतारकर हथेली पर रख लिया है, वह संसार में जो भी चाहे कर सकता है, उसके लिये कोई काम कठिन नहीं। ‘असम्भव’ तो उसके शब्द-कोष में रहता ही नहीं। ये दोनों युवक भी भगवान का नाम लेकर पतितपावनी कलिमलहारिणी भगवती भागीरथी की गोद में बिना शंका के कूद पड़े। मानो आज वे जलती हुई भव-दावाग्नि से निकलकर जगज्जननी माँ जाह्नवी की सुशीतल क्रोड में शाश्वत शान्ति के निमित्त सदा के लिये प्रवेश करते हों।
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गंगा जी के किनारे रहने वाले छोटे-छोटे बच्चे भी खूब तैरना जानते हैं, फिर ये तो युवक थे और तैरने में प्रवीण थे, सामान इन लोगों के पास कुछ था ही नहीं, इसलिये ये निर्विघ्न गंगा पार हो गये। जाड़े का समय था, शरीर के सभी वस्त्र भीग गये थे, किन्तु इन्हें इस बात का ध्यान ही नहीं था। शीतोष्णादि द्वन्द्व तो तभी तक बाधा पहुँचा सकते हैं जब तक कि शरीर में ममत्व होता है। शरीर से ममत्व कम हो जाने पर मनुष्य द्वन्द्वों की वेदना से ऊँचा उठ जाता है, तभी वह निर्द्वन्द्व हो सकता है।
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विश्वरूप निर्द्वन्द्व हो चुके थे। वे गीले ही वस्त्रों से आगे बढ़े चले गये। इसके पश्चात् विश्वरूप जी का कोई निश्चित वृत्तान्त नहीं मिलता। पीछे से यही पता चला कि इन्होंने किसी अरण्य नामक संन्यासी से संन्यास ग्रहण कर लिया और इनके संन्यास का नाम हुआ शंकरारण्य। इनके संन्यासी हो जाने पर लोकनाथ ने इनसे संन्यास लिया। दो वर्षों तक ये भारत के अनेक तीर्थों में भ्रमण करते रहे।
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अन्त में महाराष्ट्र के परम प्रसिद्ध तीर्थ पण्ढरपुर में इन्होंने श्रीविट्ठलनाथ जी के क्षेत्र में अपना यह पांच भौतिक शरीर त्याग कर दिया। देहत्याग के पूर्व इन्होंने अपना स्वकीय तेज श्रीमन्माधवेन्द्रपुरी के आश्रम में उनके परम प्रिय शिष्य श्रीईश्वरपुरी को प्रदान कर दिया था। उन्हीं से वह तेज नित्यानन्द के पास आया। इसीलिये नित्यानन्द को बलराम या शेषनाग को अवतार मानते हैं। इस प्रसंग को पाठक आगे समझेंगे। इधर प्रातःकाल हुआ।
(क्रमशः)

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