मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

१७. विश्वरूप का वैराग्य

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*सुरति समाइ सन्मुख रहै, जुग जुग जन पूरा ।*
*दादू प्यासा प्रेम का, रस पीवै सूरा ॥*
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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१७. विश्वरूप का वैराग्य
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इधर विश्वरूप के विचारों में और अधिक गम्भीरता आने लगी। पंद्रह वर्ष की अवस्था के पश्चात् सभी युवकों के हृदयों में एक प्रकार की महान खलबली-सी उत्पन्न हुआ करती है। चित्त किसी अत्यन्त प्यारे के मिलन के लिये तड़पता रहता है। हृदय में एक मीठी-मीठी वेदना-सी होती है। जी चाहता है अपने को किसी के ऊपर न्यौछावर कर दें।
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इसी बात को समझकर माता-पिता इस अवस्था में लड़के का विवाह कर देते हैं और अपने हृदय को समर्पण करने के निमित्त संगिनी पाकर बहुत-से शान्त हो जाते हैं। बहुत-से धन के बन्धन में फँसकर, बहुत-से मित्र के प्रेम में फँसकर और बहुत-से विषयवासनाओं में फँसकर उस वेग को शान्त कर लेते हैं। उस वेग को जिधर लगाओ उधर ही वह लग जायगा।
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विश्वरूप ने उस प्रेम को माता-पिता के ही बीच में सीमित न रखकर उसे विश्व के साथ तद्रूप बनाना चाहा। वे इसी बात को सोचते रहते थे कि इस कोलाहलपूर्ण संसार से कैसे उपरत हो सकेंगे?
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जब इन्होंने अपने विवाह की बात सुनी तब तो मानो इनके वैराग्यरूपी प्रज्वलित अग्नि में घृत की आहुति पड़ी। ये बार-बार सोचने लगे- ‘क्या विवाह करके संसारी सुख भोगने से मुझे परम शान्ति मिल सकेगी? क्या मैं गृहस्थी बनके अपने चरम लक्ष्य तक शीघ्र-से-शीघ्र पहुँच सकूँगा? क्या मुझे माता-पिता और भाइयों के ही बीच में अपने प्रेम को सीमित बनाकर संसारी बनना चाहिये?’
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उनकी यह विकलता बढ़ती ही जाती थी। एक दिन लोकनाथ ने एकान्त में इनसे पूछा- ‘भैया ! क्या कारण है, तुम अब सदा किसी गम्भीर विचार में डूबे रहते हो?’ उनकी बात सुनकर इन्होंने उन्हें टालते हुए कहा- ‘नहीं, कुछ नहीं, वैसे ही शास्त्रविषयक बातें सोचता रहता हूँ, कोई विशेष बात तो नहीं है।’

उन्होंने फिर कहा- ‘आप चाहे बतावें या न बतावें मैं सब जानता हूँ। फूफा जी आपके विवाह की सोच रहे हैं। आपके भावों को खूब जानता हूँ, कि आप विवाह के बन्धन में कभी न फँसेंगे। आप इसके लिये सबका त्याग कर सकते हैं, किन्तु मैं आपके चरणों में यही विनीत भाव से प्रार्थना करता हूँ कि मुझे अपने चरणों से पृथक न करें- यही मेरी अन्तिम प्रार्थना है।’
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विश्वरूप ने उन्हें गाढ़ आलिंगन करते हुए कहा- ‘भैया ! तुम कैसी बात कर रहे हो। यदि ऐसा कुछ होगा भी तो मैं तुम्हारी सम्मति के बिना कुछ थोड़े ही कर सकता हूँ। तुम तो मेरे प्राण हो, भला तुम्हें छोड़कर मैं कैसे जा सकता हूँ। दोनों भाई यथासमय भोजन करने के निमित्त अपने-अपने घर चले गये। .
विश्वरूप घर में बहुत ही कम रहते थे, केवल दोपहर को और शाम को भोजन करने के निमित्त घर जाते, नहीं तो सदा अद्वैताचार्य जी की पाठशाला में ही शास्त्रालोचना तथा गम्भीर विचार करते रहते। इसीलिये माता-पिता को इनके मनोभावों के सम्बन्ध में विशेष जानकारी नहीं हो सकी।
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बीच-बीच में जब निमाई इन्हें बुलाने जाते तब ये थोड़ी देर के लिये घर आ जाते और कभी-कभी निमाई से दो-चार बातें करते। मिश्र जी इनसे बातें करने में संकोच करते थे। इनके पढ़ने में किसी प्रकार का विघ्न नहीं डालना चाहते थे। धीरे-धीरे विश्वरूप का वैराग्य दिन-प्रति-दिन अधिकाधिक बढ़ने लगा।
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एक बार उन्होंने ज्ञानदृष्टि से देखा कि ये माता, पिता, भाई, मित्र आदि असल में चीज क्या हैं? विचार करते-करते वे संसारी-सम्बन्धों से ऊँचे उठ गये। उन्हें प्रतीत होने लगा, सभी प्राणी अपने प्रारब्ध-कर्मों के अनुसार बिना सोचे-समझे दिन-रात कर्मों में जुटे हुए हैं। अन्धे की भाँति बिना आगे का ध्यान किये किसी अज्ञात मार्ग की ओर चले जा रहे हैं।
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विचार करते-करते उन्हें संसार के सभी प्राणी समानरूप से रेंगते हुए-से दीखने लगे। जैसे किसी बहुत ऊँचे स्थान पर चढ़कर देखने से मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष सभी छोटे-छोटे भिनगे-से उड़ते दिखायी पड़ते हैं, उनमें फिर विवेक नहीं किया जा सकता कि कौन मनुष्य है, कौन पशु। सभी समानरूप से छोटे-छोटे कण-से दिखायी पड़ते हैं, उसी प्रकार विचार की ऊँची भित्ति पर चढ़कर विश्वरूप को ये संसारी जीव दीखने लगे।
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उनका माता-पिता तथा बन्धु-बान्धवों के प्रति जो मोह था, वह एकदम जाता रहा। वे अपने को समझ गये और मन-ही-मन कहने लगे- ‘ये संसारी लोग भी कितने दया के पात्र हैं ! रोज न जाने क्या-क्या विचार करते रहते हैं। बड़े-बड़े विधान बनाते रहते हैं, किन्तु सभी किसी अज्ञात शक्ति की प्रेरणा से घूम रहे हैं।’ लोग कहते हैं, ‘अजी अभी संसार का सुख भोग लो। आगे चलकर भगवद्भजन कर लेंगे। वे अज्ञ यह नहीं समझते कि यह शरीर क्षणभंगुर है, इसका दूसरे क्षण का भी पता नहीं।’ इन विचारों के आते ही उन्होंने अपना कर्तव्य निश्चित कर लिया।
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भर्तृहरि जी के इस श्लोक को वे बार-बार पढ़ने लगे-
यावत् स्वस्थमिदं कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा
यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता यावत्क्षयो नायुषः।
आत्मश्रेयसि तावदेव विदुषा कार्यः प्रयत्नो महान्
प्रोद्दीप्ते भवने च कूपखननं प्रत्युद्यमः कीदृशः॥
‘अरे ओ युवको ! जब तक यह कोमल और नूतन शरीर स्वस्थ है, जब तक वृद्धावस्था तुमसे बहुत दूर चुपचाप तुम्हारी ताक में बैठी है, जब तक तुम्हारी इन्द्रियों की शक्ति न्यून नहीं हुई है और जब तक यह आयु शेष नहीं हुई है, तब तक ही आत्मा के कल्याण का प्रयत्न कर लो, इसी में बुद्धिमानी है। नहीं तो घर में आग लगने पर जो कुँआ खोदने की बात सोचकर चुपचाप बैठा है, उसके घर में आग लगने पर वह जल ही जायगा। आग लगने पर कुँआ खोदने में प्रयत्न करना मूर्खता है।’
(क्रमशः)

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