🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*काहे रे बक मूल गँवावै,*
*राम के नाम भलें सचु पावै ॥टेक॥**वाद विवाद न कीजे लोई,*
*वाद विवाद न हरि रस होई ।*
*मैं मैं तेरी मांनै नाँहीं हीं,*
*मैं तैं मेट मिलै हरि मांहीं ॥१॥*
*हार जीत सौं हरि रस जाई,*
*समझि देख मेरे मन भाई !*
*मूल न छाड़ी दादू बौरे,*
*जनि भूलै तूँ बकबे औरे ॥२॥*
*(श्री दादूवाणी ~ पद. २७९)*
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साभार ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु,* *शान्ति*
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एक समय अकबर बादशाह के दरबार में गंगा यमुना की श्रेष्ठता के विषय में विवाद चला । किसी ने गंगा को और किसी ने यमुना को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयत्न किया किन्तु सन्तोष जनक निर्यण नहीं हो सका । तब जीव गोस्वामी जी को बुलवाया ।उनका प्रण था कि रात्रि में ब्रजभूमी के बिना वे नहीं रहते थे । एक पहर में ब्रज में पहुँचने का वचन देकर गोस्वामी जी को आगरा लाया गया ।
जीव गोस्वामीजी ने सभा में कहा - "इस अल्प कार्य के लिये मुझे क्यों बुलवाया, कोई भी पुराण देख लेते । पुराण इतिहासों मे गंगा को पूर्णब्रह्म का चरणामृत और यमुना जी को पूर्णब्रह्म की पटरानी लिखा है । अब आप ही विचार कर लें कि कौन बड़ी है ।" यह सुन कर सब श्रोतागण प्रसन्न हुये और विवाद मिट गया । इससे ज्ञात होता है कि शान्त पुरुष युक्ति से वाद विवाद को सहज ही मिटा देते है ।
शांत युक्ति से हरत हैं, विवाद को तत्काल ।
जीव गुसांई ने हरा, सुन श्रोता सुनिहाल ॥३६९॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^^

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