गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

= १५० =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*राम रसिक वांछै नहीं, परम पदारथ चार ।*
*अठसिधि नव निधि का करै, राता सिरजनहार ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ निष्काम पतिव्रता का अंग)*
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साभार ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
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*श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु,* *साधना*
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एक साधु कुछ खाता नहीं था और सिद्ध नाम से प्रसिद्ध था, वह एक सत्संगी राजा के बाग में आकर ठहर गया । राजा को प्रतिदिन अपनी सिद्धि की बात सुनाता हुआ कहता था कि यह सिद्धि मैं तुम्हें बता दूंगा, सीख लो । राजा ने उसका व्यवहार जानने के लिये गुप्तचर नियुक्त कर दिये । एक दिन रात्रि के समय बाग के महल से एक सूअर निकला और बाहर मल खाकर के पुन: आ गया । गुप्तचरों ने राजा को सुना दिया । 
सिद्ध ने फिर राजा से कहा - तुम मुझ से सिद्धि सीख लो । राजा ने कहा - महाराज ! मल खाना भी कोई सिद्धि है क्या ? आप थोड़ी देर के लिये सुअर बन कर मल खाते हैं और सूअर तो सदा ही मल खाता है । इससे तो सुअर आपसे बड़ा सिद्ध हुआ । यह सुन कर सिद्ध लज्जित होकर नीचे देखने लगा कुछ भी नहीं बोल सका । इससे ज्ञात होता है कि प्रतिष्ठा के तुच्छ भोग हेतु कठिन साधन करना भूल है -
साधन मलीन करत जो, पूजा हित तिहिं लाज ।
मल खाना क्या सिद्धि है, बोल उठ नटराज ॥१५५॥
#### श्री दृष्टान्त सुधा सिन्धु ####
### श्री नारायणदासजी पुष्कर, अजमेर ###
^^^^^^^//सत्य राम सा//^^^^^^^

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