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*दादू सोच करै सो सूरमा, कर सोचै सो कूर ।*
*कर सोच्यां मुख श्याम ह्वै, सोच कियां मुख नूर ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ विचार का अंग)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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*परिच्छेद ३~तृतीय दर्शन*
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥(गीता, ६/२९)
*नरेन्द्र भवनाथ तथा मास्टर*
मास्टर उस समय वराहनगर में अपनी बहन के यहाँ ठहरे थे । जब से श्रीरामकृष्ण के दर्शन हुए तब से मन में सब समय उन्हीं का चिन्तन चल रहा है । मानो आँखों के सामने सदा वही आनन्दमय रूप दिखायी दे रहा हो, कानों में वही अमृतमयी वाणी सुनायी दे रही हो । मास्टर सोचने लगे, इस निर्धन ब्राह्मण ने इन गम्भीर आध्यात्मिक तत्त्वों को कैसे खोज निकाला, किस प्रकार उनका ज्ञान प्राप्त किया? इसके पहले उन्होंने इतनी सरलता से इन गूढ़ तत्त्वों को समझाते हुए कभी किसी को नहीं देखा था । मास्टर दिनरात यही विचार करने लगे कि कब उनके पास जाऊँ और उन्हें देखूँ ।
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देखते ही देखते रविवार(५ मार्च) आ गया । वराहनगर के नेपालबाबू के साथ दोपहर को तीन-चार बजे के लगभग वे दक्षिणेश्वर में आ पहुँचे । देखा, श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में छोटे तखत के ऊपर विराजमान । कमरा भक्तों से ठसाठस भरा हुआ है । रविवार के कारण अवसर पाकर कई भक्त दर्शन के लिए हैं । उस समय मास्टर का किसी के साथ परिचय नहीं हुआ था; वे भीड़ में एक ओर जाकर बैठ गए । देखा, श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ प्रसन्नमुख हो वार्तालाप कर रहे हैं ।
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एक उन्नीस साल के लड़के की ओर देखते हुए श्रीरामकृष्ण बड़े आनन्द के साथ वार्तालाप कर रहे हैं । लड़के का नाम है नरेन्द्र१(१.बाद में ये ही स्वामी विवेकानन्द के नाम से प्रसिद्ध हुए)। अभी ये कालेज में पढ़ते हैं और साधारण ब्राह्मसमाज में कभी कभी जाते हैं । इनकी आँखें पानीदार और बातें जोशीली हैं । चेहरे पर भक्तिभाव है ।
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मास्टर को अनुमान से मालुम हुआ कि विषयासक्त संसारियों की बातें चल रही हैं । ये लोग ईश्वरभक्त, धर्मपरायण व्यक्तियों की निन्दा किया करते हैं । फिर संसार में कितने दुर्जन व्यक्ति हैं, उनके साथ किस प्रकार बर्ताव करना चाहिए- ये सब बातें होने लगीं ।
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श्रीरामकृष्ण(नरेन्द्र से)-क्यों नरेन्द्र, भला तू क्या कहेगा? संसारी मनुष्य तो न जाने क्या कहते हैं । पर याद रहे कि हाथी जब जाता है, तब उसके पीछे पीछे कितने ही जानवर बेतरह चिल्लाते हैं । पर हाथी लौटकर देखता तक नहीं । तेरी कोई निन्दा करे तो तू क्या समझेगा?
नरेन्द्र- मैं तो समझूँगा कि कुत्ते भौंकते हैं ।
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श्रीरामकृष्ण(सहास्य)- अरे नहीं, यहाँ तक नहीं । (सब का हास्य) सर्वभूतों में परमात्मा का ही वास है । पर मेल-मिलाप करना हो तो भले आदमियों से ही करना चाहिए, बुरे आदमियों से अलग ही रहना चाहिए । बाघ में भी परमात्मा का वास है, इसलिये क्या बाघ को भी गले लगाना चाहिए? (लोग हँस पड़े ।) यदि कहो कि बाघ भी तो नारायण है, इसलिये क्यों भागें? इसका उत्तर यह है कि जो लोग कहते हैं कि भाग चलो, वे भी तो नारायण हैं, उनकी बात क्यों न मानो ?
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“एक कहानी सुनो । किसी जंगल में एक महात्मा थे । उनके कई शिष्य थे । एक दिन उन्होंने अपने शिष्यों को उपदेश दिया कि सर्वभूतों में नारायण का वास है, यह जानकर सभी को नमस्कार करो । एक दिन एक शिष्य हवन के लिए जंगल में लकड़ी लेने गया । उस समय जंगल में यह शोरगुल मचा था कि कोई कहीं हो तो भागो, पागल हाथी जा रहा है । सभी भाग गए, पर शिष्य न भागा ।
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उसे तो यह विश्वास था कि हाथी भी नारायण है, इसलिये भागने का क्या काम? वह खड़ा ही रहा । हाथी को नमस्कार किया और उसकी स्तुति करने लगा । इधर महावत के ऊँची आवाज लगाने पर भी कि भागो भागो, उसने पैर न उठाए । पास पहुँचकर हाथी ने उसे सूँड से लपेटकर एक ओर फेंक दिया और अपना रास्ता लिया । शिष्य घायल हो गया और बेहोश पड़ा रहा ।
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“यह खबर गुरु के कान तक पहुँची । वे अन्य शिष्यों को साथ लेकर वहाँ गए और उसे आश्रम में उठा लाए । वहाँ उसकी दवा-दारू की, तब वह होश में आया । कुछ देर बाद किसी ने उससे पूछा, हाथी को आते सुनकर तुम वहाँ से हट क्यों न गए? उसने कहा कि गुरुजी ने कह तो दिया था कि जीव, जन्तु आदि सब में परमात्मा का ही वास है, नारायण ही सब कुछ हुए हैं, इसी से हाथी नारायण को आते देख मैं नहीं भागा ।
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गुरुजी पास ही थे । उन्होंने कहा- बेटा, हाथी नारायण आ रहे थे, ठीक है; पर, महावत नारायण ने तो तुम्हें मना किया था । यदि सभी नारायण हैं तो उस महावत की बात पर विश्वास क्यों न किया? महावत नारायण की भी बात मान लेनी चाहिए थी । (सब हँस पड़े ।)
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“शास्त्रों में है ‘आपो नारायणः’ –जल नारायण है । परन्तु किसी जल से देवता की सेवा होती है और किसी से लोग मुँह-हाथ धोते हैं, कपड़े धोते हैं और बर्तन माँजते हैं; किन्तु वह जल न पीते हैं, न ठाकुरजी की सेवा में ही लगाते हैं । इसी प्रकार साधु-असाधु, भक्त-अभक्त सभी के हृदय में नारायण का वास है; किन्तु असाधुओं, अभक्तों से व्यवहार या अधिक हेल-मेल नहीं चल सकता । किसी से सिर्फ बातचीत भर कर लेनी चाहिए और किसी से वह भी नहीं । ऐसे आदमियों से अलग रहना चाहिए ।”
(क्रमशः)

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