शुक्रवार, 21 फ़रवरी 2020

निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग ४९/५३

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🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य । 
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ 
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी 
(श्री दादूवाणी ~ ८. निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग) 
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*पर पुरुषा रत बांझणी, जाणे जे फल होइ ।* 
*जन्म बिगोवै आपना, दादू निष्फल सोइ ॥४९॥* 
*दादू तज भरतार को, पर पुरुषा रत होइ ।* 
*ऐसी सेवा सब करैं, राम न जाने सोइ ॥५०॥* 
जो बाह्य स्त्री अपने पति को निर्विय मान कर पर पुरुष से रत रहती है तो उसको बांझ होने से पुत्र लाभ तो मिलता नहीं और निन्दनीय कर्म करने से स्वर्ग भी नहीं मिलता । मुक्त भी नहीं हो सकती क्योंकि ब्रह्म ज्ञान का अभाव है । अतः उस नारी का जन्म व्यर्थ ही है । ऐसे ही जो ब्रह्म को नपुंसक लिंग होने से असमर्थ समझकर देवताओं की उपासना करता है तो बांझ नारी की तरह उसका जन्म भी निरर्थक ही है । क्योंकि ज्ञानाभाव के कारण मोक्ष नहीं हो सकता । शाश्वतिक स्वर्ग सुख भी नहीं पा सकता क्योंकि पुण्य क्षीण होने पे वापस आना पड़ेगा । 
गीता में कहा है कि “हे अर्जुन जो विषयासक्त पुरुष हैं वे अपने स्वभाव से प्रेरित हुए उन उन भोगों की कामना द्वारा ज्ञान से भ्रष्ट हुए उस उस नियम को धारण करके अर्थात् जिस-जिस देवता की आराधना के लिये जो-जो नियम लोक प्रसिद्ध हैं उन उन नियमों को धारण करके अन्य देवताओं को भजते हैं । परन्तु उन अल्प बुद्धि वालों को नाशवान फल प्राप्त होता है । देवताओं को पूजने वाले देव लोक में जाते हैं । मेरे भक्त मेरे को चाहे जैसे ही भजें, शेष में मेरे को ही प्राप्त होते हैं ।” 
*॥ पतिव्रत ॥* 
*नारी सेवक तब लगै, जब लग सांई पास ।* 
*दादू परसै आन को, ताकी कैसी आस ॥५१॥* 
नारी जब तब अपने पति की सेवा तथा आज्ञा पालन करती है तो वह पतिव्रता मानी जायगी । यदि वह कभी कोई कामना से अन्य पुरुष के पास जाती है तो उसका पातिव्रत्य सुन्दर नहीं लगता । अर्थात् उस का पातिव्रत्य भंग हो जाता है । वैसे ही जो भक्त जीवनपर्यन्त यदि हरि को भजता है तब तो वह हरि भक्त सच्चा है और यदि इच्छा से परमात्मा को छोड़ कर किसी अन्य देवता की उपासना करता है तो वह हरि भक्त नहीं होगा । 
*॥ आन लगन व्यभिचार ॥* 
*दादू नारी पुरुष को, जाने जे वश होइ ।* 
*पीव की सेवा ना करै, कामणिगारी सोइ ॥५२॥*
पति स्त्री की सेवा से ही वश में होता है । ऐसे भगवान् भी भक्ति सेवा प्रेम से ही राजी होते हैं । यदि कोई स्त्री पति की सेवा का त्याग कर पति को वश करने के लिए जादू टोना मंत्र आदि उपाय करने लगे तो उसका यह व्यभिचार होगा, जिस से वह नारी व्यभिचारिणी कहलायेगी । गीता में कहा है कि- 
जो नारी संपूर्ण कर्मों को त्याग करके मेरा(सगुण ईश्वर का) निरन्तर अनन्य मन से ध्यान करते हुए भजती हैं, उन प्रेमी भक्तों को शीघ्र ही संसार सागर से पार कर देता हूँ । क्योंकि उनका चित्त मेरे में ही लगा रहता है । 
*॥ करुणा ॥* 
*कीया मन का भावता, मेटी आज्ञाकार ।* 
*क्या ले मुख दिखलाइये, दादू उस भर्तार ॥५३॥* 
जो स्त्री अपने पति की सेवा तो करती नहीं, और न उसकी आज्ञा का ही पालन करती तो वह अपने पति के सन्मुख कैसे जायेगी । ऐसे ही जिन्होंने भगवान् की शरणागति ग्रहण नहीं करी और न सेवा ही करी तो वह साधक कैसे भगवान् के सन्मुख जायेगा । किन्तु अन्य अन्य अपने मन को अच्छे लगने वाले कर्म को करता है भगवान् के प्रिय कार्यों को करता नहीं तो वह सर्व साधन विहीन होने के कारण साधनलभ्य भगवान् को कैसे प्राप्त कर सकेगा? 
(क्रमशः)

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