🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त Ram Gopal तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ ८. निहकर्मी पतिब्रता कौ अंग)
.
*सब आया उस एक में, डाल पान फल फूल ।*
*दादू पीछे क्या रह्या, जब निज पकड़या मूल ॥७२॥*
*खेत न निपजै बीज बिन, जल सींचे क्या होइ ।*
*सब निष्फल दादू राम बिन, जानत है सब कोइ ॥७३॥*
*दादू जब मुख मांहि मेलिये, तब सब ही तृप्ता होइ ।*
*मुख बिन मेले आन दिश, तृप्ति न माने कोइ ॥७४॥*
*जब देव निरंजन पूजिये, तब सब आया उस मांहि ।*
*डाल पान फल फूल सब, दादू न्यारे नांहि ॥७५॥*
इन पद्यों में श्री दादूजी महाराज ब्रह्म की उपासना को दृढ़ कर रहे हैं । केवल परिश्रम ही है और जैसे खेत में बीज बोये बिना जल का सींचना व्यर्थ है तथा मूढता को ही बोधित करता है अथवा जैसे शरीरस्थ प्राणों को मुख से भोजन दिये बिना शरीर के अंगों का भोजन से लेप करने से भोजन का दुरूपयोग ही होगा । तथा हंसी कराने वाली बात होगी । इसी प्रकार ब्रह्म की उपासना के बिना केवल देवताओं की उपासना स्वर्गादि तुच्छ फल को देने वाली बात होते हुए भी निष्फल मानी गई है । क्योंकि मनुष्य जन्म केवल भोगों के लिये ही नहीं है किन्तु कल्याण के लिये है । देवताओं की उपासना से कल्याण नहीं होता अतः सबको ब्रह्म की उपासना करनी चाहिये । उसकी उपासना से सारे देवताओं की उपासना हो जायगी । क्योंकि ब्रह्म सर्वरूप सर्व कारण है । कारण से कार्य भिन्न नहीं होता किन्तु कारण रूप ही होता है । उपनिषद् में कहा है कि एक के जान लेने से सब कुछ जाना जाता है, जैसे मिट्टी के पिण्डे को जान लेने से मृन्मय घट शराब आदि सब जाने जाते हैं । घट पट आदि नामधेय तो वाणी का विकार होने से मिथ्या है, मृत्तिका ही सत्य है । भागवत् में कहा है कि जैसे वृक्ष की जड़ में पानी देने पर डाली पत्ते पुष्प फल आदि का सिंचन अपने आप ही हो जाता है । प्राणों को भोजन देने से शरीर के अंगों में भोजन पहुँच जाता है । ऐसे ही ब्रह्म की उपासना से सब उपासना हो जाती है । गीता में कहा है कि-
“हे अर्जुन ! मेरे सिवाय किंचित् मात्र भी दूसरी वस्तु नहीं है । यह सम्पूर्ण जगत् सूत्र में मणियों के सदृश मेरे में गुंथा हुआ है ।
यह सब जगत् मेरी अव्यक्त मूर्ति से व्याप्त है । सारे प्राणी मेरे में स्थित हैं परन्तु मैं उनमें नहीं हूं ।”
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें