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*जब द्रवो तब दीजिये, तुम पै मांगूं येहु ।*
*दिन प्रति दर्शन साधु का, प्रेम भक्ति दृढ़ देहु ॥*
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साभार ~ Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*२६. पूर्व बंगाल की यात्रा*
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विद्वत्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते॥[१]
([१] विद्वान और राजा की कोई परस्पर में समता करे तो राजा विद्वान की समता के योग्य कभी सिद्ध हो ही नहीं सकता। कारण कि राजा की तो अपने ही देश में मान-प्रतिष्ठा होती है, किन्तु विद्वान जहाँ भी जाता है वहीं उसकी पूजा-प्रतिष्ठा होती है। सु. र. भां. ४०/७)
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विधि के विधान को कोई ठीक-ठीक समझ नहीं सकता। जिसके पास प्रचुर परिणाम में भोज्य-पदार्थ हैं, उसे पाचनशक्ति नहीं। जिसकी पाचनशक्ति ठीक है, उसे यथेष्ठ भोज्य-पदार्थ नहीं मिलते। विद्वानों के पास धन का अभाव है, जिनमें विद्या-बुद्धि नहीं उनके पास आवश्यकता से अधिक अर्थ भरा पड़ा है। जहाँ धन है वहाँ सन्तान नहीं, जहाँ बहुत सन्तान है। वहाँ भोजन के लाले पड़े हुए हैं।
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इसी बात से तो खीजकर किसी कवि ने ब्रह्मा जी को बुरा-भला कहा है। वे कहते हैं-
❉गन्धः सुवर्णे फलमिक्षुदण्डे
❉नाकारि पुष्पं खलु चन्दनेषु।
❉विद्वान् धनाढ्यो न तु दीर्घजीवी
❉धातुःपुरा कोऽपि न बुद्धिदोऽभूत॥
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❉कवि की दृष्टि में ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचने में बड़ी भारी भूल की है। देखिये सुवर्ण कितना सुन्दर है, उसमें यदि सुगन्ध होती तो फिर उसकी उत्तमता का कहना ही क्या था। ईख के डंडे में जब इतनी मिठास है, तब यदि उसके ऊपर कहीं फल लगता तो वह कितना स्वादिष्ट होता? ब्रह्मा जी उस पर फल लगाना ही भूल गये।
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❉चन्दन की लकड़ी में जब इतनी सुगन्ध है, तो उस पर कहीं फूल लगता होता तो उसके बराबर उत्तम फूल संसार में और कौन हो सकता? सो ब्रह्मा जी को उस पर फूल लगाने का ध्यान ही न रहा।
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❉विद्वान लोग बिना रूपये-पैसे के ही आकाश-पाताल एक कर देते हैं, यदि उनके पास कहीं धन होता तो इस सृष्टि की सभी विषमता को दूर कर देते, सो उन्हें दरिद्री ही बना दिया, साथ ही उनकी आयु भी थोड़ी बनायी।
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❉इन सब बातों को सोचकर कवि कहता है कि इसमें बेचारे ब्रह्मा जी का कुछ दोष नहीं है, मालूम पड़ता है, सृष्टि करते समय ब्रह्मा जी को कोई योग्य सलाह देने वाला चतुर मन्त्री नहीं मिला। इसीलिये जल्दी में ऐसी गड़बड़ी हो गयी। मन्त्री के अभाव में हुई हो अथवा उन्होंने जान-बुझकर की हो, यह गलती तो ब्रह्मा जी से जरूर ही हो गयी कि उन्होंने विद्वानों को निर्धन ही बनाया।
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विद्वानों को प्रायः धन के लिये सदा परमुखापेक्षी ही बनना पड़ता है। किसी ने तो यहाँ तक कह डाला है ‘अनाश्रया न शोभन्ते पण्डिता वनिता लताः’ अर्थात पण्डित, स्त्री और बेल बिना आश्रय के भले ही नहीं मालूम पड़ते। बेचारे पण्डितों को वनिता-लता के साथ समानता करके उनकी व्यथा को और भी बढ़ा दिया है। जिस समय की हम बातें कह रहे हैं, उस समय संस्कृत-विद्या की आज की भाँति दुर्गति नहीं थी।
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भारतवर्ष भर में संस्कृत-विद्या का प्रचार था। बिना संस्कृत पढे़ कोई भी मनुष्य सभ्य कहला ही नहीं सकता था। बंगाल में ब्राह्मण ही संस्कृत-विद्या के पण्डित नहीं थे, किन्तु कायस्थ, वैश्य तथा अन्य जाति के कुलीन पुरुष भी संस्कृत-विद्या के पूर्ण ज्ञाता थे।
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उस समय पण्डितों की दो ही वृत्तियाँ थीं, या तो वे पठन-पाठन करके अपना निर्वाह करें या किसी राजसभा का आश्रय लें। पण्डित सदा से ही दरिद्र होते चले आये पूर्व बंगाल की यात्रा है, इसका कारण एक कवि ने बहुत ही सुन्दर सुझाया है।
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उसने एक इतिहास बताते हुए कहा है कि ब्रह्मा जी के सुकृति(लक्ष्मी) और दुष्कृति(दरिद्रता) दो कन्याएँ थीं। सुकृति बड़ी थी, इसलिये विवाह के योग्य हो जाने पर ब्रह्मा जी ने उसे बिना ही सोचे-समझे मूर्ख को दे डाला। मूर्ख के यहाँ उसकी दुर्गति देखकर ब्रह्मा जी को बड़ा पश्चात्ताप हुआ। तभी से वे दूसरी पुत्री दुष्कृति के लिये अच्छा-सा वर खोज रहे हैं, जिसे भी विद्वान, कुलीन और सर्वगुणसम्पन्न देखते हैं उसे ही दरिद्रता को दे डालते हैं।
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निमाई पण्डित विद्वान थे, गुणवान थे, रूपवान और तेजवान भी थे, भला ऐसे योग्य वर को ब्रह्मा जी कैसे छोड़ सकते थे? उनके यहाँ भी दरिद्रता का साम्राज्य था, किन्तु वह निमाई पण्डित को तनिक व्यथा नहीं पहुँचा सकती। उनके सामने सदा हाथ बाँधे दूर ही खड़ी रहती थी। निमाई उसकी जरा भी परवा नहीं करते थे।
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उन दिनों योग्य और नामी पण्डित देश-विदेशों में अपने योग्य छात्रों के साथ भ्रमण करते थे, सद्गृहस्थ उनकी धन, वस्त्र और खाद्य-पदार्थों के द्वारा पूजा करते थे। आज की भाँति पण्डितों की उपेक्षा कोई भी नहीं करता था। निमाई की भी पूर्व बंगाल में भ्रमण करने की इच्छा हुई। उन्होंने अपनी माता की अनुमति से अपने कुछ योग्य छात्रों के साथपूर्व बंगाल की यात्रा की। उस समय लक्ष्मी देवी को अपने पितृगृह में रख गये थे।
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श्रीगंगा जी को पार करके निमाई पण्डित अपने शिष्यों के साथ पद्मा नदी के तट पर राढ़-देश में पहुँचे। बंगाल में भगवती भागीरथी की दो धाराएँ हो जाती हैं। गंगा जी की मूल शाखा पूर्व की ओर जाकर जो बंगाल के उपसागर में मिली है, उसका नाम तो पद्मावती है। दूसरी जो नवद्वीप होकर गंगा सागर में जाकर समुद्र से मिली है उसे भागीरथी गंगा कहते हैं। ब्रह्मपुत्र नदी के ओर दक्षिण-तट से लेकर पद्मा नदी पर्यन्त के देश को राढ़-देश कहते हैं। पहले ‘बंगाल’ इसे ही कहते थे।
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उत्तर-तट को गौड़ देश कहते थे और दक्षिण-तट को बंगाल या राढ़ के नाम से पुकारते थे। आज जिसे पूर्व बंगाल कहते हैं, यथा-
रत्नाकरं समारभ्य ब्रह्मपुत्रान्तगं शिवे।
बंगदेशो मया प्रोक्तः सर्वसिद्धिप्रदर्शकः॥
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गौड़-देश वालों से बंग-देश वालों का आचार-विचार भी कुछ-कुछ भिन्न था और अब भी है। निमाई पण्डित ने पद्मा के किनारे-किनारे पूर्व बंगाल के बहुत-से स्थानों में भ्रमण किया। जो भी लोग इनका आगमन सुनते वे ही यथाशक्ति भेंट लेकर इनके पास आते। वहाँ के विद्यार्थी कहते- ‘हम बहुत दिनों से आपकी प्रशंसा सुन रहे थे। आपकी लिखी हुई व्याकरण की टिप्पणी बड़ी ही सुन्दर है। हमें अपने पाठ में उससे बहुत सहायता मिलती है।’
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कोई कहते- ‘आपकी पद-धूलि से यह देश पावन बन गया, आपके प्रकाण्ड पाण्डित्य की हम प्रशंसा ही मात्र सुनते थे। आपके गुणों की कौन प्रशंसा कर सकता है?’ इस प्रकार लोग भाँति-भाँति से इनकी प्रशंसा और पूजा करने लगे। इनके साथियों को भय था कि पण्डित जी यहाँ भी नवद्वीप की भाँति चंचलता करेंगे तो सब गुड़ गोबर हो जायगा, किन्तु ये स्वयं देशकाल को समझकर बर्ताव करने वाले थे।
कई मास तक ये पूर्व बंगाल में भ्रमण करते रहे, किन्तु वहाँ इन्होंने एक दिन भी चंचलता नहीं की। एक योग्य गम्भीर पण्डित की भाँति ये सदा बने रहते थे। इनसे जो जिस विषय का प्रश्न पूछता उसे उसी के प्रश्न के अनुसार यथावत उत्तर देते। यहाँ इन्होंने वैष्णवों की आलोचना नहीं की, किन्तु उलटा भगवद्भक्ति का सर्वत्र प्रचार किया।
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इन्होंने लोगों के पूछने पर भगवन्नाम का माहात्म्य बताया, भक्ति की श्रेष्ठता सिद्ध की और कलियुग में भक्ति-मार्ग को ही सर्वश्रेष्ठ, सुलभ और सर्वोपयोगी बताया। किन्तु ये बातें इन्होंने एक विद्वान पण्डित की ही हैसियत से कही थीं, जैसे विद्वानों से जो भी प्रश्न करो उसी का शास्त्रानुसार उत्तर दे देंगे। भक्ति का असली स्त्रोत तो इनका अभी अव्यक्तरूप से छिपा ही हुआ था। उसे प्रवाहित होने में अभी देरी थी। फिर भी इनके पाण्डित्यपूर्ण उत्तरों से राढ़-देशवासी श्रद्धालु मनुष्यों को बहुत लाभ हुआ।
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वे भगवन्नाम और भक्ति के महत्त्व को समझ गये, उनके हृदय में भक्ति का एक नया अंकुर उत्पन्न हो गया, जिसे पीछे से गौरांग की आज्ञानुसार नित्यानन्द प्रभु ने प्रेम से सींचकर पुष्पित, पल्लवित, फलान्वित बनाया। इस प्रकार ये शास्त्रीय उपदेश करते हुए राढ़-देश के मुख्य-मुख्य स्थानों में घूमने लगे।
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शाम को अपने साथियों को लेकर ये पद्मों में स्नान करते और घण्टों एकान्त में जलविहार करते रहते। लोग बड़े सत्कार से इन्हें खाने-पीने की सामग्री देते। इनके साथी अपना भोजन स्वयं ही बनाते थे। इस प्रकार इनकी यात्रा के दिन आनन्द से कटने लगे।
(क्रमशः)

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