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*दादू सोई हमारा सांइयां, जे सबका पूरणहार ।*
*दादू जीवन मरण का, जाके हाथ विचार ॥*
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साभार ~ Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*२७. पत्नी-वियोग और प्रत्यागमन*
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पतिर्हि देवो नारीणां पतिर्बन्धुः पतिर्गतिः।
पत्युर्गतिसमा नास्ति दैवतं वा यथा पतिः॥[१]
([१] स्त्रियों का पति ही देवता है, पति ही बन्धु है और पति ही गति है। पति के समान उनकी कोई दूसरी गति नहीं और पति के समान उनका कोई दूसरा देवता नहीं। सु. र. भां. ३६६/१४)
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पत्नी गृहस्थाश्रम में एक सर्वश्रेष्ठ और सर्वप्रधान वस्तु है, गृहिणी के बिना गृहस्थ ही नहीं। पत्नी गृहस्थ के कार्यों में मन्त्री है, सेवा करने में दासी है, भोजन कराने में माता के समान है, शयन में रम्भा के समान सुखदात्री है, धर्म के कार्यों में अर्धांगिनी है, क्षमा में पृथ्वी के समान है अर्थात् गृहस्थ की योग्य गृहिणी ही सर्वस्व है।
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जिसके घर में सुचतुर सुन्दरी और मृदुभाषिणी गृहिणी मौजूद है, उसके यहाँ सर्वस्व है, उसे किसी चीज की कमी ही नहीं और जिसके गृहिणी ही नहीं, उसके है ही क्या? लोकप्रिय निमाई पण्डित की पत्नी लक्ष्मीदेवी ऐसी ही सर्वगुणसम्पन्ना गृहिणी थीं। वे पति को प्राणों के समान प्यार करती थीं, सास की तन-मन से सदा सेवा करती रहती थीं और सदा मधुर और कोमल वाणी से बोलती थीं। उनका नाम ही लक्ष्मीदेवी नहीं था, वस्तुतः उनमें लक्ष्मीदेवी के सभी गुण भी विद्यमान थे। वे मत्र्यलोक में लक्ष्मी के ही समान थीं।
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ऐसी ही पत्नी को तो नीतिकारों ने लक्ष्मी बताया है-
यस्य भार्या शुचिर्दक्षा भर्तारमनुगामिनी।
नित्यं मधुरवक्त्री च सा रमा न रमा रमा॥
अर्थात ‘जिसकी भार्या पवित्रता रखने वाली, गृहकार्यों में दक्ष और अपने पति के मनोअनुकूल आचरण करने वाली है, जो सदा ही मीठी वाणी बोलती है, असल में तो वही लक्ष्मी है। लोग जो ‘लक्ष्मी-लक्ष्मी’ पुकारते हैं, वह कोई और लक्ष्मी नहीं हैं।’
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निमाई पण्डित की पत्नी लक्ष्मीदेवी सचमुच में ही लक्ष्मी थीं। पूर्व बंगाल की यात्रा के समय माता के आग्रह से निमाई लक्ष्मीदेवी को उनके पितृगृह में कर गये थे। पति के वियोग के समय पतिव्रता लक्ष्मीदेवी ने बड़े ही प्रेम से अपने स्वामी के चरण पकड़ लिये ओर वियोग-वेदना का स्मरण करके वे फूट-फूटकर रोने लगीं। निमाई ने उन्हें धैर्य बँधाते हुए कहा- ‘इस प्रकार दुःखी होने की कौन-सी बात है? मैं बहुत ही शीघ्र लौटकर आ जाऊँगा, तब तक तुम यहीं रहो। मैं बहुत दिन के लिये थोड़े ही जाता हूँ। वैसे ही दस-बीस दिन घूम-घामकर आ जाऊँगा।’
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उन्हें क्या पता था, कि यह लक्ष्मी देवी से अन्तिम ही भेंट है, इसके बाद लक्ष्मी देवी से इस लोक में फिर भेंट न हो सकेगी। लक्ष्मीदेवी को भाँति-भाँति से आश्वासन देकर निमाई पण्डित ने पूर्व बंगाल की यात्रा की। इधर लक्ष्मीदेवी पति के वियेाग में खिन्न चित्त से दिन गिनने लगीं, उन्हें पति के बिना यह सम्पूर्ण संसार सूना-ही-सूना दृष्टिगोचर होता था। उन्हें संसार में पति के सिवा प्रसन्न करने वाली कोई भी वस्तु नहीं थी।
प्रसन्नता की मूल वस्तु के अभाव में उनकी प्रसन्नता एकदम जाती रही, वे सदा उदास ही बनी रहने लगीं। उदासी के कारण उन्हें अन्न-जल कुछ भी अच्छा नहीं लगता था। उनकी अग्नि मन्द हो गयी, पाचनशक्ति नष्ट हो गयी ओर विरह-ज्वाला के ताप से सदा ज्वर-सा रहने लगा।
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पिता ने चिकित्सकों को दिखाया, किन्तु बेचारे संसारी वैद्य इस रोग का निदान कर ही क्या सकते हैं ! वात, पित्त, कफ के सिवा वे चौथी बात जानते ही नहीं हैं। यह इन तीनों से विलक्षण ही धातु-विकार व्याधि है, इस कारण वैद्यों के उपचार से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ।
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धीरे-धीरे लक्ष्मी देवी का शरीर अधिकाधिक क्षीण होने लगा। किसी को भी उनके जीवन की आशा न रही। वे मानो अपने अत्यन्त क्षीण शरीर को अन्तिम बार पति-दर्शनों की लालसा से ही टिकाये हुए हैं, किन्तु उनकी यह अभिलाषा पूरी न हो सकी। निमाई पण्डित को पूर्व बंगाल में अनुमान से अधिक दिन लग गये।
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अन्त में बड़े कष्ट के साथ वियोग-व्यथा को न सह सकने के कारण अपने पतिदेव के चरण-चिह्नों को हृदय में धारण करके उन्होंने इस पांचभौतिक शरीर का त्याग कर दिया। वे इस मर्त्यलोक की भूमि को त्यागकर सतियों के रहने योग्य अपने-पुण्य-लोक में पति-मिलन की आकांक्षा से चली गयीं। घरवालों ने रोते-रोते उनके सभी संस्कार किये।
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इधर निमाई पण्डित को पूर्व बंगाल में भ्रमण करते हुए कई मास बीच गये। अब इन्हें घर की चिन्ता होने लगी। इन्हें भान होने लगा कि हमारे घर पर जरूर कुछ अनिष्ट हुआ है, हृदय के भाव तो असंख्यों कोसों पर से हृदय में आ जाते हैं। लक्ष्मी देवी की अन्तिम वेदना इनके हृदय को पीड़ा पहुँचाने लगी। इन्हें अब कहीं आगे जाना अच्छा नहीं लगता था, इसलिये इन्होंने साथियों को नवद्वीप लौट चलने की आज्ञा दी। आज्ञापाकर सभी नवद्वीप लौट चलने की तैयारियाँ करने लगे।
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बहुत-से नवीन छात्र भी विद्योपार्जन के निमित्त इनके साथ हो लिये थे। उन सभी को साथ लेकर ये नवद्वीप की ओर चल पड़े। इन्हें काफी धन तथा अन्य आवश्यकीय वस्तुएँ भेंट तथा उपहार में प्राप्त हुई थीं। थोडे़ दिनों में ये फिर नवद्वीप में ही आ गये। इनके आगमन का समाचार बिजली की तरह नगर में फैल गया। इनके इष्ट, मित्र, स्नेही तथा पुराने छात्र दर्शनों के लिये इनके घर पर आने लगे। ये सभी से यथोचित प्रेमपूर्वक मिले।
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सभी ने यात्रा के कुशल-समाचार पूछे। इन्होंने सबसे पहले अपनी माता के चरणों को स्पर्श किया। माता का चेहरा मुरझाया हुआ था, वे पुत्र-वधू के वियोग और पुत्र की चिन्ता के कारण अत्यन्त दुःखी-सी मालूम पड़ती थीं। चिरकाल के बिछडे़ हुए अपने प्रिय पुत्र को पाकर माता के सुख का वारापार न रहा। गौ जिस प्रकार बिछुड़े हुए बछड़े को पाकर उसे प्रेम से चाटने लगती है उसी प्रकार माता निमाई के युवा शरीर के ऊपर अपना शीतल और कोमल कर फिराने लगीं।
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उनकी आँखों से निरन्तर प्रेमाश्रु निकल रहे थे। निमाई ने हँसते हुए पूछा- ‘अम्मा ! सब कुशल तो है? मुझे अनुमान भी नहीं था, कि इतने दिन लग जायँगे, तुम्हें पीछे कोई कष्ट तो नहीं हुआ’ पुत्र के ऐसा पूछने पर माता चुप ही रहीं। तब किसी दूसरी स्त्री ने धीरे से लक्ष्मी देवी के परलोक-गमन की बात इनसे कह दी। सुनते ही इनके चेहरे पर दुःख, सन्ताप और वियोग के भाव प्रकट होने लगे। माता और भी जोरों के साथ्ज्ञ रुदन करने लगीं।
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निमाई की भी आँखों में अश्रु आ गये। उन्हें पोंछते हुए धीरे-धीरे वे माता को समझाने लगे- ‘माँ, विधि के विधान को मेट ही कौन सकता है? जो भाग्य में बदा होगा, वह तो अवश्य ही होकर रहेगा। इतने ही दिनों तक तुम्हारी पुत्र-वधू का तुमसे संयोग बदा था, इस बात को कौन जानता था?’ माता ने रोते-रोते कहा- ‘बेटा, अन्तिम समय में भी वह तेरे आने की ही बात पूछती रही। ऐसी बहू अब मुझे नहीं मिलेगी, साक्षात लक्ष्मी ही थी।’ निमाई यह सुनकर चुप हो गये। माता फिर बड़े जोरों से रोने लगीं।
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इस पर प्रभु ने कुछ जोर देकर कहा- ‘अम्मा ! अब चाहे तू कितनी भी रोती रह, तेरी पुत्र-वधू तो अब लौटकर आने की नहीं। वह लौटने के लिये नहीं गयी है। अब तो धैर्य-धारण से ही काम चलेगा।’ पुत्र के ऐसे समझाने पर माता ने धैर्य-धारण करके अपने आँसू पोंछे और निमाई को स्नानादि करने के लिये कहा। फिर स्वयं उन सबके लिये भोजन बनाने में लग गयीं। भोजन से निवृत्त होकर निमाई पण्डित अपने इष्ट-मित्रों के साथ पूर्व बंगाल की यात्रा-सम्बन्धी बहुत- सी बातें करने लगे और फिर पूर्व की भाँति पाठशाला में जाकर पढ़ाने लगे।
(क्रमशः)

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