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*सुन्दरि सुरति सिंगार कर, सन्मुख परसे पीव ।*
*मो मंदिर मोहन आविया, वारूं तन मन जीव ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. १६६)
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साभार ~ Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*३२. श्रीविष्णुप्रिया-परिणय*
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सनातन मिश्र के यहाँ तिथि आदि की सभी बातें पक्की करके काशीनाथ घटक आ ही रहे थे कि रास्ते में अकस्मात उनकी निमाई पण्डित से भेंट हो गयी। निमाई ने उन्हें आलिंगन करते हुए कहा- ‘किधर से आ रहे हैं?’ आप तो सदा घटया ही करते हैं। कहिये किसे घटकर आये हैं?
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हँसते हुए घटक ने कहा- ‘घटाकर तो नहीं आये हैं बढ़ाने की ही फ़िक्र है, तुम्हें एक से दो करना चाहते हैं। बताओ, क्या सलाह है?’ कुछ आश्चर्य-सा प्रकट करते हुए निमाई पण्डित ने कहा- ‘मैं आपकी बात का मतलब नहीं समझा। कैसा बढ़ाना, स्पष्ट बताइये?’
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जरा आवाज को बढ़ाते हुए जोर देकर घटक ने कहा- ‘राजपण्डित सनातन मिश्र की पुत्री के साथ तुम्हारे परिणय की बातें पक्की करके आ रहा हूँ। बताओ तुम्हें मंजूर है न?’ बड़े जोर से हँसते हुए इन्होंने कहा- ‘हहाहा ! हमारा विवाह? और राजपण्डित की पुत्री के साथ ! हमें तो कुछ भी पता नहीं’ यह कहते-कहते ये हँसते हुए घर चले गये।
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घटक को इनकी सूखी हँसी में कुछ सन्देह हुआ। सनातन मिश्र के यहाँ भी खबर पहुँच गयी। सुनते ही घर भर में सुस्ती छा गयी। सनातन मिश्र ने कहा- ‘जिस बात की शंका थी, वही हुई। मैं पहले ही जानता था, निमाई स्वतन्त्र प्रकृति के पुरुष हैं, वे भला, इस प्रकार सम्बन्ध को कब मंजूर करने वाले थे ! हुआ तो कुछ भी नहीं, उलटी मेरी सब लोगों में हँसी हुई।
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सबको पता चल गया है कि लड़की का विवाह निमाई पण्डित के साथ होगा। यदि न हो सका तो मेरे लिये बड़ी लज्जा की बात है।’ यह सोचकर उन्होंने उसी समय काशीनाथ घटक को बुलाया और अपनी चिन्ता का कारण बताकर शीघ्र ही शचीमाता से इसके सम्बन्ध में निश्चित उत्तर ले आने की प्रार्थना की।
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घटक महाशय उसी समय शचीमाता के समीप गये और राजपण्डित की चिन्ता का सभी वृत्तान्त कह सुनाया। सब कुछ सुनकर शची माता ने कहा- ‘निमाई मेरी बात को कभी टालता नहीं है, इसीलिये मैंने उससे इस सम्बन्ध में कुछ भी पूछ-ताछ नहीं की। आज वह पाठशाला से आवेगा तो मैं उससे पूछ लूँगी। मेरा ऐसा विश्वास है, वह मेरी बात को टाल नहीं सकता। कल मैं तुम्हें इसका ठीक-ठीक उत्तर दूँगी।’ माता का ऐसा उत्तर सुनकर घटक अपने घर को चले गये।
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इधर जब शाम को पाठशाला से पढ़ाकर निमाई घर आये तब माता ने इधर-उधर की दो-चार बातें करके बड़े प्रेम से कहा- ‘निमाई बेटा ! मैं एक बात पूछना चाहती हूँ। क्या सनातन मिश्रवाला सम्बन्ध तुझे मंजूर नहीं है? लड़की तो बड़ी सुशील ओर चतुर है। मैं उसे रोज गंगा जी पर देखती हूँ।’ कुछ लजाते हुए निमाई ने कहा- ‘मैं क्या जानूँ, जो तुम्हें अच्छा लगे वह करो।’
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माता को यह उत्तर सुनकर सन्तोष हुआ। इन्होंने अपनी माता के सन्तोषार्थ स्वयं एक मनुष्य के द्वारा सनातन के यहाँ विवाह की तैयारी करने की खबर भेज दी। इस खबर के पाते ही सनातन मिश्र के घर में फिर से दुगुना आनन्द छा गया और वे धूम-धाम के साथ पुत्री के विवाह की तैयारियाँ करने लगे।
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इधर निमाई पण्डित के पास इतना द्रव्य नहीं था कि वे राजपण्डित की पुत्री के साथ खूब समारोह के साथ विवाह कर सकें। इसके लिये वे कुछ चिन्तित-से हुए। धीरे-धीरे इस बात की खबर इनके सभी विद्यार्थी तथा स्नेहियों को लग गयी।
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विद्यार्थी बड़े प्रसन्न हुए और आ-आकर कहने लगे- ‘गुरुजी ! ज्योंनार की मिठाइयाँ तो खूब खाने को मिलेंगी। सनातन तो राजपण्डित ठहरे। खूब जी खोलकर विवाह करेंगे। बढ़िया-बढ़िया मिठाइयाँ बनावेंगे। खूब आनन्द रहेगा।’ ये सबकी बातें सुनकर हँस देते।
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उस समय नवद्वीप में बुद्धिमन्त खाँ ही सबसे बड़े जमींदार थे। वे उस समय के एक प्रकार से नवद्वीप के राजा ही समझे जाते। निमाई पण्डित से वे बहुत स्नेह करते थे। इनके विवाह की बात सुनकर वे इनके पास पाठशाला में आये। जिनके चण्डी-मण्डप में ये पढ़ाते थे, वे मुकुन्द संजय भी वहीं बैठे थे। उन्होंने इनका आगत-स्वागत किया।
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बुद्धिमन्त खाँ ने कहा- ‘पण्डित जी ! सुना है आप दूसरा विवाह कर रहे हैं? यह बात कहाँ तक सच है? सुना है अबके राजपण्डित की पुत्री पसंद की है।’ कुछ लजाते हुए इन्होंने कहा- ‘आप जो भी सुनेंगे सब सत्य ही होगा। भला, आपके सामने झूठ बात कहने की किसकी हिम्मत हो सकती है?’
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इस उत्तर से प्रसन्न होकर बुद्धिमन्त खाँ ने कहा- ‘तब तो खूब मिठाई खाने को मिलेगी। हाँ, एक प्रार्थना मेरी है, इस विवाह का सम्पूर्ण खर्च मेरे जिम्मे रहा।’ बीच में ही मुकुन्द संजय बोल उठे- ‘वाह साहब ! सब आपका ही रहा, हम वैसे ही रहे। कुछ हमें भी तो अवसर दीजिये। अकेले-ही-अकेले आनन्द उठा लेना ठीक नहीं।’
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हँसते हुए बुद्धिमन्त खाँ ने जवाब दिया- ‘आप भी अपनी इच्छा पूर्ण कर लें। कुछ भिखमंगे ब्राह्मण का विवाह थोड़े ही है। राजपण्डित की पुत्री के साथ शादी है। राजकुमार की ही भाँति खूब ठाट-बाट से विवाह करेंगे। आप जितना भी चाहें खर्च कर लें।’ इस प्रकार विवाह के सम्पूर्ण खर्च का भार तो इन दोनों धनिकों ने अपने ऊपर ले लिया। अब निमाई इस बात से तो निश्चिन्त हो गये, फिर भी उन्हें बहुत-सा काम स्वयं ही करना था। उसे लिये वे विद्यार्थियों की सहायता से स्वयं ही सब काम करने लगे।
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सभी बड़े-बड़े पण्डितों को निमंत्रित किया गया। विद्वन्मण्डली में से ऐसा एक भी पण्डित नहीं बचने पाया जिसके पास निमन्त्रण न पहुँचा हो। इधर पूर्वोक्त दोनों धनाढ्यों ने विवाह के लिये गाने-नाचने का, आतिशबाजी-फुलवारी का, अच्छे-अच्छे बाजों का तथा और भी सजावट के बहुत-से सामानों का भलीभाँति प्रबन्ध किया।
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नियत तिथि के दिन अपने स्नेही बहुत-से पण्डित, विद्यार्थियों तथा अन्य गण्यमान्य सज्जनों के साथ बरात सजाकर निमाई पण्डित विवाह के लिये चले। वे आगे-आगे पालकी में जा रहे थे। दोनों ओर चमर ढुर रहे थे। सबसे आगे भाँति-भाँति के बाजे बज रहे थे। इस प्रकार खूब समारोह के साथ वे सनातन मिश्र के द्वार पर जा पहुँचे।
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मिश्रजी ने सब लोगों का यथोचित खूब सम्मान किया। सभी के ठहरने, खाने-पीने और मनोरंजन का उन्होंने बहुत ही उत्तम प्रबन्ध कर रखा था। उनके स्वागत-सत्कार से सभी लोग अत्यन्त ही प्रसन्न हुए। गोधूलि के शुभ लग्न में निमाई पण्डित ने विष्णुप्रिया का पाणिग्रहण किया।
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ब्राह्मणों ने स्वस्त्ययन पढ़ा, वेदज्ञों ने हवन कराया। इस प्रकार विवाह के सभी लौकिक तथा वैदिक कृत्य बड़ी ही उत्तमता के साथ समाप्त हुए। विष्णुप्रिया ने पतिदेव के चरणों में आत्मसमर्पण किया और निमाई ने उन्हें वामांग करके स्वीकार किया।
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सनातन मिश्र ने बहुत-सा धन तथा बहुमूल्य वस्त्राभूषण निमाई के लिये भेंट में दिये। इस सब कार्यों के हो जाने पर विवाह के सब कार्य समाप्त किये गये। दूसरे दिन सनातन मिश्र ने सभी विद्वान पण्डितों की सभा की। उनकी योग्यतानुसार यथोचित पूजा की और द्रव्यादि देकर खूब सत्कार किया।
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तीसरे दिन विष्णुप्रिया के साथ दोला(पालकी) में चढ़कर निमाई अपने घर आये। चिरकाल से जिसे अपनी पुत्र-वधू बनाने के लिये माता उत्सुक थी, आज उसे ही पुत्र के साथ अपने घर में आयी देखकर माता की प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा।
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वह उस युगल जोड़ी को देखकर मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न हो रही थी। घर में घुसते समय चौखट में उँगली पिच जाने के कारण विष्णुप्रिया के कुछ खून निकल आया था। इसे अपशकुन समझकर उनका चित्त पहले तो कुछ दुःखी हुआ था, किन्तु थोड़े दिनों में वे इस बात को भूल गयी थीं। जब निमाई संन्यास लेकर चले गये, तब उन्हें यह घटना याद आयी थी और वह उसे स्मरण करके दुःखी हुई थीं। इस प्रकार विष्णुप्रिया को पाकर निमाई अत्यन्त ही प्रसन्न हुए और विष्णुप्रिया भी अपने सर्वगुणसम्पन्न पति को पाकर परम आह्लादित हुईं।
(क्रमशः)

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