मंगलवार, 3 मार्च 2020

*३३. प्रकृति-परिवर्तन*

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*जे बोलैं तो चुप कहैं, चुप तो कहैं पुकार ।*
*दादू क्यों कर छूटिये, ऐसा है संसार ॥*
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*३३. प्रकृति-परिवर्तन*
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परोपदेशकुशला दृश्यन्ते बहवो जनाः।
स्वभावमतिवर्तन्तः सहस्रेष्वपि दुर्लभाः॥[१]
([१] दूसरे को बड़े-बड़े, ऊँचे-ऊँचे, उत्तम-से-उत्तम उपदेश करने वाले तो बहुत-से सुचतुर पण्डित मिल जायँगे, किन्तु जो एकदम अपने स्वभाव को ही पलट दें, ऐसे पुरुष हजारों में भी दुर्लभ हैं। कहीं करोड़ों में कोई ऐसे पुरुष निकलते हैं। सु. र. भां. ७७/४)
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बाल्यावस्था का स्वभाव आगे चलकर धीरे-धीरे बदल जाता है, किन्तु युवावस्था में जो स्वभाव बन जाता है, उसका परिवर्तित होना अत्यन्त ही कठिन है। अवस्था ज्यों-ज्यों प्रौढ़ होती जाती है, त्यों-त्यों स्वभाव में भी प्रौढ़ता होने लगती है और फिर जिस मनुष्य का जैसा स्वभाव होता है वही उसका आगे के लिये स्वाभाविक गुण बन जाता है।
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बहुधा ऐसा भी देखा गया है कि बहुत-से लोगों का जीवन एकदम पलट जाता है, वे क्षणभर में ही कुछ-से-कुछ बन जाते हैं। जो आज महाविषयी-सा प्रतीत होता है, वही कल परम वैष्णवों के-से आचरण करने लगता है। जिसे हम कल तक आवारा-आवारा कहकर पुकारते थे, थोड़े दिनों में सहस्रों नर-नारी सिद्ध महात्मा मानकर उसी की पूजा-अर्चा करते हुए देखे गये हैं, किन्तु ऐसा परिवर्तन सभी पुरुषों के जीवन में नहीं होता। ऐसे तो कोई विरले ही भाग्यशाली महापुरुष होते हैं।
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प्रायः देख गया है कि मनुष्य जब प्राकृति विचारों से ऊँचे उठने लगता है, तब हृदय के परिवर्तन के साथ उसके शरीर में भी परिवर्तन हो जाता है। शरीर के सभी अवयव स्वभाव के ही अनुसार बने हैं, मनुष्य जैसे-जैसे प्राकृतिक विचारों को छोड़ने लगता है वैसे-वैसे उसके अंग-प्रत्यंग भी बदलते जाते हैं। साधारण लोग उस परिवर्तन को रोग समझने लगते हैं।
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जो एकदम प्रकृति से ऊँचा उठ गया है, फिर उसका पांचभौतिक शरीर अधिक काल स्थिर नहीं रह सकता। क्योंकि शरीर के स्थायित्व के लिये रजोगुणजन्य प्राकृतिक अहंभाव की कुछ-न-कुछ आवश्यकता पड़ती ही है। तभी तो परम भावुक ज्ञानी और प्रेमी अल्पावस्था में ही इस शरीर को त्याग जाते हैं। श्रीशंकाराचार्य, चैतन्यदेव, ज्ञानेश्वर, रामतीर्थ, जगद्बन्धु ये सभी परम भावुक भगवत-भक्त प्रकृति से अत्यन्त ऊँचे उठ जाने के ही कारण शरीर को अधिक दिन नहीं टिका सके।
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कोई-कोई महापुरुष, अपने सत्संकल्प का कुछ अंश देकर लोक-कल्याण की दृष्टि से उस अवस्था में पहुँचने पर भी कुछ काल के लिये इस शरीर को टिकाये रहते हैं, फिर भी उनमें भावुकता की अपेक्षा ज्ञानांश की कुछ अधिकता होती है, तभी वे ऐसा कर सकते हें।
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भावुकता की चरम सीमा पर पहुँचने पर तो संकल्प करने का होश ही नहीं होता। जब हृदय में सहसा प्रबल भावुकता का उदय होता है, तो निर्बल शरीर उसका सहन नहीं कर सकता। किसी-किसी का शरीर तो उसी वेग में शान्त हो जाता है, बहुत-से उसे सहन तो कर लेते हैं, किन्तु पागल हो जाते हैं, कुछ कर-धर नहीं सकते।
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जिनसे भगवान को कुछ काम कराना होता है, वे उस वेग को पूर्णरीति से सहन करने में समर्थ होते हैं, किन्तु शरीर पर उसका कुछ-न-कुछ असर पड़ना तो स्वाभाविक ही है, इसलिये उनके शरीर में या तो वायुरोग हो जाता है या अतिसार। बहुधा इन दो भयंकर रोगों के द्वारा ही उस भाव का शमन हो सकता है।
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संसारी लोगों को ये रोग प्रायः चालीस-पचास वर्ष की अवस्था के बाद हुआ करते हैं, किन्तु जिन लोगों के शरीर में प्रबल भावुकता के उदय होने के उद्वेग में ये रोग होते हैं, उनके लिये कोई नियम नहीं, कभी हो जाय। असल में उनके ये रोग साधारण लोगों के रोग की भाँति यथार्थ रोग नहीं होते, किन्तु वे रोग-से ही प्रतीत होते हैं और भावों के शमन होने पर आप ही शान्त हो जाते हैं।
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परमहंस रामकृष्णदेव को युवावस्था में ही यह उद्वेग उत्पन्न हुआ। किसी ने उसे वायुरोग, किसी ने मस्तिष्क रोग और किसी ने वीर्योन्मादरोग बताया। उनके परम भक्त मथुरा बाबू तो चिकित्सकों के कहने से उन्हें वेश्याओं तक के यहाँ ले गये, किन्तु उन्हें उन्माद या वायुरोग हो तब तो।
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वहाँ भी वे छोटे बालक की भाँति क्रीड़ा करते रहे। सालों वे अतिसार के भयंकर रोग से पीड़ित बने रहे। उनके इस भाव को एक ब्राह्मणी ने ही समझा। पीछे से उनके बहुत-से भक्त भी समझ गये। चिकित्सक इन्हें अन्त तक वायुरोग बताते रहे और बोलने से मना करते रहे, किन्तु इन्होंने शरीर को टिका ही इसलिये रखा था, चिकित्सकों के मना करने पर भी धारा प्रवाह बोलते रहे, अन्त में गले में फोड़ा-सा हुआ और उसी की भयंकर वेदना में महीनों बिताकर वे इस नश्वर शरीर को त्याग गये।
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गले के फोड़े को चिकित्सक लोग अधिक बोलने का विकार बताते, उसके कारण इतनी पीड़ा होती कि तोले भर दूध पीने में भी उन्हें महाकष्ट होता था, किन्तु इस अवस्था में भी वे भक्तों को उपदेश तो निरन्तर करते ही रहे। चिकित्सकों के बार-बार जोर देकर मना करने पर वे कह देते- ‘अब इस शरीर का बनेगा ही क्या? इससे जिसका जितना भी उपकार हो सके उतना ही उत्तम है।’ क्योंकि वे शरीर के प्राकृतिक स्वभाव से एकदम ऊँचे उठ गये थे।
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अब निमाई पण्डित के भी प्रकृति-परिवर्तन का समय आया। निमाई परम भावुक थे, यदि सचमुच इनके हृदय में एक साथ ही प्रबल भावुकता की भारी बाढ़ आती, तो चाहे इनका शरीर कितना भी बलवान क्यों नहीं था, वह उसका सहन कभी नहीं कर सकता।
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इसलिये इनकी भावुकता का उत्तरोत्तर विकास हुआ और अन्त में तो वे शरीर को एकदम भूलकर समुद्र में ही कूद पड़े। इनके जीवन में प्रेम के जैसे उत्तरोत्तर अद्वितीय भाव प्रकट हुए हैं, वैसे भाव संसार का इतिहास खोजने पर भी किसी प्रकटरूप से उत्पन्न हुए महापुरुष के जीवन में शायद ही मिलें !
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किसी के जीवन में क्या, बहुतों के जीवन में ये भाव प्रकट हुए होंगे, किन्तु वे संसार की दृष्टि से दूर जाकर प्रकट हुए होंगे, संसारी लोगों को उन भावों का पता नहीं चैतन्य के जीवन के भाव तो भक्तों ने प्रत्यक्ष देखे और उनके समकालीन लेखकों ने यथासाध्य उनका वर्णन करने की चेष्टा भी की है, किन्तु वे भाव तो अवर्णनीय हैं। संसारी भाषा इन अलौकिक भावों का वर्णन कर ही कैसे सकती है?
(क्रमशः)

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