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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ ९७/१००*
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रोम रोम भीतरि लख्या, निरमल हरि का नांम ।
सुरत्यों बांचै अतमा, जगजीवन सब ठांम ॥९७॥
संत कहते हैं कि रोम रोम में राम दिखे सबसे शुद्ध वही ईश्वर का नाम है उसे ध्यान से पढा जाय तो सब जगह वह ईश्वर ही है।
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रांम रांम भजि प्रीति सों, रोम रोम ल्यौ लाइ ।
जगजीवन कुसमल५ सकल, सहजैं ही कटि जाइ ॥९८॥
संत कहते हैं कि हे जीवात्मा तू राम स्मरण प्रेम से कर और हर रोम को एकाग्रता ईश्वर में लगा दे तेरे जीवन के सारे पाप दोष सब कट जायेंगे। (५. कुसमल-कल्मष = पाप)
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सुमिरन सबद संभाहिले, सुमिरन राखे जीव ।
सुमिरन करतां पाइये, जगजीवन सो पीव ॥९९॥
संत कहते हैं कि स्मरण से वाणी नियंत्रित होती है। स्मरण से ही जीव रहता है स्मरण करते करते जिससे भेंट होती है वे ही प्रभु हैं।
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सुमिरन करतां सबद जे, रांम सुणावै आइ ।
जगजीवन सो राखिये, रांम रमण कै भाइ ॥१००॥
संत कहते हैं भजन करते करते जिस शब्द से राम ध्वनित हो उसे ही पुनरावृत्ति हेतु रखे। वह ही राम का सानिध्य देगा।
(क्रमशः)

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