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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ ९३/९६*
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सुमिरन का सुख छडि करि, जे कुछ कथिये आंन ।
जगजीवन सो रांम बिन, फीका१० लागै ग्यांन ॥९३॥
संत कहते हैं कि स्मरण का सुख छोड़ कर यदि और कुछ कहते हैं तो वो सारा ज्ञान ईश्वर महिमा के बिना आनंद रहित लगता है।
(१०. फीका-स्वाद रहित)
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आगे अगम अलंग१ है, धसै दीनता मांहि ।
सुमिरन लागे जात है, जगजीवन रस मांहि ॥९४॥
संत कहते हैं कि आगे ईश्वर है जो कि दीनता के पोषक है और जो दीन भाव से भजनानंद को भजता है उसके संग वह प्रभु विकट होते हुये भी निकट है।
(१. अलंग-एक ओर, तरफ)
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करि करि सुमिरन मन दिया, मन के साटै२ जोषि३ ।
जगजीवन तहां रांम रमि, मुक्ती मेल्ही मोषि४॥९५॥
संत कहते हैं कि स्मरण कर करके मन प्रभु चरणों में लगाया जिससे सुख मिला । संतजगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि जहाँ भजन के माध्यम से राम रमते हैं वहां मुक्ति सहज ही मिलती है।
(२. साटै-बदले में) (३. जोषि-सुख या उत्साह) (४. मोषि-मोक्ष)
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जगजीवन सुमिरन सदा, कीजै सुरति लगाइ ।
तो प्रांणी सुख ऊपजै, सो सुख कह्या न जाइ ॥९६॥
संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि स्मरण ध्यान से करें । स्मरण की लै लगने से जो सुख मिलता है वह अवर्णनीय है।
(क्रमशः)

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