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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ ४५/४८*
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जे बोलै तो हरि कथा, मून गहै तो नांम ।
जगजीवन परगट गुपत, ऐसैं भजि ले रांम ॥४५॥
संत कहते हैं कि प्रत्यक्ष व गुप्त इस प्रकार प्रभु स्मरण किया जाये कि अगर बोले तो प्रभु महिमा और मौन रहें तो हरि स्मरण।
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विष बाणी भावै नहीं, भावै भगति निवास ।
सुने सुणावैं हरि कथा, जगजीवन ते दास ॥४६॥
संत कहते हैं संसार की बाते विष सदृश लगती है और जहां भक्ति का वास होता है वहां सब अच्छा लगता है संत कहते हैं । जो प्रभु की कथा सुनते कहते हैं वे ही प्रभु के दास है सच्चे सेवक हैं।
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आंन कथा अंतर पड़ै, परम कथा मंहि भेल ।
कहि जगजीवन दूध में, ज्यूं किंचत२ कांजी मेल ॥४७॥
संत कहते हैं किअन्य संसार की कोइ भी बात करने से उस परमात्मा की महिमा का कोइ मेल नहीं है । वह स्थिति उसी प्रकार ही है जैसे दूध में कांजी पड़ने से वह सत्व और जल को अलग कर देता है उसी प्रकार संसार की कथा जीव व ब्रह्म को अलग अलग कर देती है।
(२. किंचत-किंचित = कुछ)
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सगुरो होइ सु समझि ले, निगुरो बकै निसंक ।
कहि जगजीवन रांम बिन, कर्म कटै क्यों अंक३॥४८॥
संत कहते हैं जो गुरुमुख हैं वे तो भगवद् वाद समझते हैं और जो नहीं हैं वै बेपरवाह कुछ भी बकते रहते हैं । संत कहते हैं कि प्रभु के बिना भाग्य के करम लेख कौन काट सकता है। (३. अंक-भाग्य में लिखा)
(क्रमशः)

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