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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*२. स्मरण का अंग ~ ४१/४४*
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जीभ जलौ भगवंत बिन, फूटौ श्रवना६ येह ।
जगजीवन दूजी कथा, जबहि सुनै कछु देह ॥४१॥
संत जगजीवन दास जी महाराज कहते हैं कि बिना प्रभु नाम के यह जीभ व्यर्थ है भले ही जल जाये। और कान फूट जायें वे ईश्वर के नाम के अलावा कुछ भी न सुने। देह की सार्थकता ईश्वर भजन में ही है। (६.श्रवानां-कान)
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जगजीवन जे रांम बिन, मुख तैं काढै सास ।
तो गहि रसना काटिये, छिन भिन कीजै तास ॥४२॥
संत कहते हैं कि राम नाम के बिना एक सांस भी न हो अगर ऐसा हो तो इस जिह्वा को काट कर छिन्न भिन्न कर दे।
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श्रवणां सीसा ढालिये, सुणतां दूसर बात ।
कहि जगजीवन रांम बिन, गलि जावै सब गात ॥४३॥
संत कहते हैं कि सीसा जो की लोह से भी तीखी धातु है को पिघला कर उन कानों में डाल देना चाहिये। जो प्रभु भजन के बिना और कुछ सुनते हो उनका शरीर सब गल जायें ये सजा राम विमुख की बतायी है संतों ने।
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आंन कथा कहिये नहीं, जब लग आप बसाइ ।
जगजीवन मुख मून१ गहि, कै हरि का गुण गाइ ॥४४॥
संत कहते हैं की हमें ईश्वर के अलावा किसी की भी महिमा नहीं करनी चाहिए । जब तक सम्भव हो जीवन में दो ही स्थिति बने या तो मौन हों या प्रभु गुण गायें। {१. मून-मौन व्रत(चुप रहना)}
(क्रमशः)

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