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*दादू प्रीतम के पग परसिये, मुझ देखण का चाव ।*
*तहाँ ले सीस नवाइये, जहाँ धरे थे पाँव ॥*
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साभार ~ Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*३७. नदिया में प्रत्यागमन*
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एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या
जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः।
हसत्यथो रोदिति रौति गाय-
त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः॥[१]
{[१] नाम-संकीर्तन करने के कारण जिसका प्रभु के पाद-पद्मों में दृढ़ अनुराग उत्पन्न हो गया है, जिसका चित्त प्रेम से द्रवीभूत हो गया है ऐसा भक्त पिशाच से पकडे़ हुए के समान अथवा पागल की भाँति कभी तो जोर से खिलखिलाकर हँस पड़ता है, कभी दहाड़ मारकर रोता है, कभी रोते-रोते हू-हू करके चिल्लाने लगता है, कभी गाने लगता है और कभी संसार की कुछ भी परवा न करते हुए आनन्द उद्वेग में नृत्य करने लगता है। (ऐसे ही भक्तों के पाद-पद्मों की रज से यह पृथ्वी पावन बनती है)। श्रीमद्भा. 11/2/40}
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प्रेम में पागल हुए उन मतवालों के दर्शन जिन लोगों को स्वप्न में भी कभी हो जाते हैं, वे संसार में बड़भागी हैं, फिर ऐसे भक्तों के निरन्तर सत्संग का सौभाग्य जिन्हें प्राप्त हो सका है, उनके भाग्य की तो भला सराहना कर ही कौन सकता है? इसीलिये तो महाभागवत विदुर जी ने भगवत-दासों के दासों का दास बनने में ही अपने को कृतकृत्य माना है। सचमुच भगवत-संगियों का संग बड़ा ही मधुमय, आनन्दमय और रसमय होता है। उनका क्षणभर का भी संसर्ग हमें संसार से बहुत दूर ले जाता है। उनके दर्शनमात्र से ही आनन्द उमड़ने लगता है।
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निमाई पण्डित को मन्त्र-दीक्षा देकर श्रीईश्वरपुरी किधर और कहाँ चले गये, इसका अन्त तक किसी को पता नहीं चला। उन्होंने सोचा होगा, जगत-पूज्य प्रेमावतार लोक-शिक्षा के निमित्त गुरु मानकर हमें प्रणाम करेंगे, यह हमारे लिये अहसनीय होगा, इसलिये अब इस संसार में प्रकट रूप से नहीं रहना चाहिये।
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इसीलिये वे उसी समय अन्तर्धान हो गये। फिर जाकर कहाँ रहे, इसका ठीक-ठीक पता नहीं। इधर प्रातःकाल निमाई पण्डित उठे। लोगों ने देखा उनके शरीर का सारा कपड़ा आँसुओं से भीगा हुआ है, वे क्षणभर के लिये भी रात्रि में नहीं सोये थे। रातभर ‘हा कृष्ण ! मेरे प्यारे ! ओः बाप ! मुझे छोड़कर किधर चले गये?’ इसी प्रकार विरहयुक्त वाक्यों के द्वारा रुदन करते रहे।
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इनकी ऐसी विचित्र अवस्था देखकर अब साथियों ने गया जी में अधिक ठहरना उचित नहीं समझा। इनके शिष्य इन्हें बड़ी सावधानी के साथ इनके शरीर को सँभालते हुए नवद्वीप की ओर ले चले। ये किसी अचैतन्य पदार्थ की भाँति शिष्यों के सहारे से चलने लगे। शरीर का कुछ भी होश नहीं है। कभी-कभी होश में आ जाते हैं, फिर जोरों से चिल्ला उठते हैं, ‘हा कृष्ण ! किधर चले गये?
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प्राणनाथ ! रक्षा करो ! पतितपावन ! इस पापी का भी उद्धार करो।’ इस प्रकार ये श्रीकृष्ण प्रेम में बेसुध हुए साथियों के सहित कुमारहट्ट नाम के ग्राम में आये। जिनसे इन्होंने श्रीकृष्ण-मन्त्र की दीक्षा ली थी, जिन्होंने इन्हें पण्डित से पागल बना दिया था, उन्हीं श्रीईश्वरपुरी जी का जन्मस्थान इसी कुमारहट्ट नामक ग्राम में था।
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प्रभु ने उस नगरी को दूर से ही साष्टांग प्रणाम किया। फिर साधारण लोगों को गुरुमहिमा का महत्त्व बताने के लिये इन्होंने उस ग्राम की धूलि अपने वस्त्र में बाँध ली और साथियों से कहा- ‘इस धूलि में कभी श्रीगुरुदेव के चरण पड़े होंगे। बाल्यकाल में हमारे गुरुदेव का श्रीविग्रह इसमें कभी लोट-पोट हुआ होगा। इसलिये यह रज हमारे लिये अत्यन्त ही पवित्र है।
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इससे बढ़कर त्रिलोकी में कोई भी वस्तु नहीं हो सकती। कुमारहट्ट का कुत्ता भी हमारे लिये वन्दनीय है। जिस स्थान में हमारे गुरुदेव ने जन्म धारण किया है, जहाँ की पावन भूमि में उन्होंने क्रीड़ा की है, वह हमारे लिये लाखों तीर्थों से बढ़कर है।’ इस प्रकार गुरुदेव का माहात्म्य प्रदर्शन करते हुए वह आगे बढ़े और थोड़े दिनों में नवद्वीप पहुँच गये।
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इनके गया से लौट आने का समाचार सुनकर सभी इष्ट-मित्र, स्नेही तथा छात्र इनके दर्शन के लिये आने लगे। कोई आकर इन्हें प्रणाम करता, कोई चरण-स्पर्श करता, कोई गले लगकर मिलता। ये भी सबका यथोचित आदर करते। किसी को पुचकारते, किसी को आशीर्वाद देते, किसी के सिर पर हाथ रख देते और जो अवस्था में बड़े थे और इनके माननीय थे, उन्हें ये स्वयं प्रणाम करते। वे इन्हें भाँति-भाँति के आशीर्वाद देते।
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शचीमाता तथा विष्णुप्रिया के आनन्द का तो कुछ ठिकाना ही नहीं था। वे मन-ही-मन प्रसन्न हो रही थीं। उस भारी भीड़ में वे दोनों एक ओर चुपचाप बैठी थीं। सबसे मिल लेने पर इन्होंने प्रेमपूर्वक सभी को विदा किया और स्वयं स्नानादि में लग गये। इनका भाव विचित्र था, शरीर की दशा एकदम परिवर्तित हो गयी थी। माता को इनकी ऐसी दशा देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ, किन्तु वे कुछ पूछ न सकीं।
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तीसरे पहर जब ये स्वस्थ होकर बैठे तब श्रीमान पण्डित सदाशिव कविराज, मुरारी गुप्त आदि इनके अन्तरंग स्नेही इनके समीप आकर गया-यात्रा का वृत्तान्त पूछने लगे। सबकी जिज्ञासा देखकर इन्होंने कहना प्रारम्भ किया- ‘पुरी की यात्रा का क्या वर्णन करूँ? मैं तो पागल हो गया।
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जिस समय पादपद्मों का माहात्म्य मेरे कानों में पड़ा, जब मैंने सुना कि प्रभु के पादपद्म सभी प्रकार के प्राणियों को पावन और प्रेममय बनाने वाले हैं, पापी-से-पापी प्राणी भी इन पादपद्मों का सहारा पाकर अपार संसार-सागर से सहज में ही तर जाता है, जिन पादपद्मों के प्रक्षालित पय से त्रिलोकपावनी भगवती भागीरथी निकली हैं, उन पादपद्मों के दर्शन करने से किसे परमशान्ति न मिल सकेगी?’ इतना सुनते ही मैं बेहोश हो गया।
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प्रभु अन्तिम शब्दों को ठीक-ठीक कह भी न पाये थे कि वे बीच में ही बेहोश होकर गिर पड़े। लोगों को इनकी ऐसी दशा देखकर महान आश्चर्य हुआ। सभी भौंचक्के से एक-दूसरे की ओर देखने लगे। तीन महीने पहले उन्होंने जिस निमाई को देखा था, आज उसे इस प्रकार प्रेम में विह्वल देखकर उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। निमाई लम्बी-लम्बी साँसें ले रहे थे। उनकी आँखों में से निरन्तर अश्रु निकल रहे थे, शरीर पसीने से लथपथ हो रहा था।
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थोड़ी देर में वे ‘हा कृष्ण ! हा प्राणनाथ ! प्यारे ! ओ मेरे प्यारे ! मुझे छोड़कर कहाँ चले गये?’ यह कहते-कहते बहुत जोरों के साथ रुदन करने लगे। सभी ने शान्त करने की चेष्टा की, किन्तु परिणाम कुछ भी नहीं हुआ। इन्होंने रुँधे हुए कण्ठ से कहा- ‘आज हमारी प्रकृति स्वस्थ नहीं है। कल हम स्वयं शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी के निवासस्थान पर आकर अपनी यात्रा का समाचार सुनायँगे।’ इतना सुनकर इनके सभी साथी अपने-अपने स्थानों के लिये चले गये।
(क्रमशः)

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