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*तूँ है तैसा प्रकाश कर, अपना आप दिखाइ ।*
*दादू को दीदार दे, बलि जाऊँ विलंब न लाइ ॥*
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साभार ~ Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*३६. प्रेम-स्त्रोत उमड़ पड़ा*
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पुरी ने सरलता के साथ कहा- ‘आप श्रीकृष्ण-मन्त्र प्रदान करने को ही कहते हैं, हम आपके कहने पर अपने प्राण प्रदान कर सकते हैं, किन्तु हममें इतनी योग्यता हो तब तो? हम स्वयं अधम हैं। प्रेम का रहस्य हम स्वयं नहीं जानते फिर आप-जैसे कुलीन और विद्वान ब्राह्मण को हम मन्त्र प्रदान कैसे कर सकेंगे?’
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बड़ी सरलता के साथ आँखों में आँसू भरे हुए इन्होंने उत्तर दिया- ‘आप सर्वसामर्थ्यवान हैं, आप स्वयं ईश्वर हैं। आपका श्रीविग्रह ही प्रेम की सजीव मूर्ति है। आप चाहें तो संसार भर को प्रेम-पीयूष में प्लावित कर सकते हैं।’
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कुछ विवशता दिखाते हुए पुरी ने कहा- ‘संसार को प्रेम-पीयूष के पुण्य-पयोधि में परिप्लावित करने की एकमात्र शक्ति तो आप में ही है, किन्तु आप अपने गुरुपद के गुरुतर गौरव का सौभाग्य मुझे ही प्रदान करना चाहते हैं, तो मैं विवस हूँ। आपकी आज्ञा को टाल ही कौन प्रेम-स्त्रोत उमड़ पड़ा सकता है। जैसी आपकी आज्ञा होगी, उसी प्रकार मैं करने के लिये तैयार हूँ।’
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इतना कहकर पुरी महाशय मन्त्र-दीक्षा देने के लिये तैयार हो गये। उसी समय पत्रा देखकर दीक्षा की शुभ तिथि निश्चित की गयी। नियत तिथि आ गयी। निमाई पण्डित नवीन उल्लास और आनन्द के साथ मन्त्र-दीक्षा लेने के लिये तैयार हो गये।
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इनके सभी साथियों ने उस दिन दीक्षोत्सव के उपलक्ष्य में खूब तैयारियाँ की थीं। नियत समय पर पुरी महाशय आ गये। उनकी पद-धूलि इन्होंने मस्तक पर चढ़ाई और स्वस्त्ययन के पुण्य-श्लोक पढ़कर और भगवान के मधुर-मंजुल नामों का संकीर्तन करने के अनन्तर पुरी महाशय ने इनके कान में ‘गोपीजनवल्लभाय नमः’ इस दशाक्षरमन्त्र का उपदेश कर दिया।
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मन्त्र के श्रवणमात्र से ही ये मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े और इन्हें अपने शरीर का बिलकुल ही होश नहीं रहा। साथियों ने भाँति-भाँति के उपचार करके इन्हें सावधान किया। बहुत देर के अनन्तर इन्हें कुछ होश हुआ। तब तो इनकी विचित्र ही दशा हो गयी। कभी तो खूब जोरों के साथ हँसते, कभी रोते और कभी ‘हा कृष्ण ! हा पिता !’ ऐसा कहकर जोरों से रुदन करते।
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कभी यह कहते हुए कि ‘मैं तो श्रीकृष्ण के पास व्रज में जाऊँगा’ व्रज की ओर भागते। इनके साथी इन्हें पकड़-पकड़कर लाते, किन्तु ये पागलों की भाँति उनसे अपने शरीर को छुड़ा-छुड़ाकर भागते। कभी फिर उसी भाँति जोरों से प्रलाप करने लगते। रोते-रोते कहते- ‘प्यारे ! मुझे छोड़कर तुम कहाँ चले गये? मेरे कृष्ण ! मुझे अपने साथ ही ले चलो।’ इतना कहकर फिर जोरों से रोने लगते।
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कभी रोते-रोते अपने विद्यार्थियों तथा साथियों से कहते- ‘भैया ! तुम लोग अब अपने-अपने घर जाओ। अब हम लौटकर घर नहीं जायँगे, हम तो अब श्रीकृष्ण के पास वृन्दावन में ही जाकर रहेंगे। हमारी माता को हमारा हाथ जोड़कर प्रणाम कहना और कह देना तेरा निमाई तो पागल हो गया है।’
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इनके सभी साथी इनकी ऐसी अलौकिक दशा देखकर चकित रह गये और इनका भाँति-भाँति से प्रबोध करने लगे, किन्तु ये किसी की मानते ही नहीं थे। इस प्रकार रुदन तथा प्रलाप में रात्रि हो गयी। सभी साथी तथा शिष्यगण सुख की नींद में सो गये, किन्तु इन्हें नींद कहाँ?
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सुखी संसार सुखरूपी मोह-निशा में शयन कर सकता है, किन्तु जिनके हृदय में विरह-वेदना की तीव्र ज्वाला उठ रही है, उनके नयनों में नींद कहाँ? सबके सो जाने पर ये जल्दी से उठ खड़े हुए और रात्रि में ही रुदन करते हुए व्रज की ओर दौड़े। इनके प्राण श्रीकृष्ण से मिलन के लिये छटपटा रहे थे। इन्होंने साथी तथा शिष्यों की कुछ भी परवा न की और घोर अन्धकार में अकेले ही अलक्षित स्थान की ओर चल पड़े।
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ये थोड़ी दूर ही चले होंगे कि इन्हें मानो अपने हृदय में एक दिव्य वाणी सुन पड़ी। इन्हें भास हुआ मानो कोई अलक्षित भाव से कह रहा है- ‘तुम्हारा व्रज में जाने का अभी समय नहीं आया है, अभी कुछ काल और धैर्य धारण करो। अभी अपने सत्संग से नवद्वीप के भक्तों को आनन्दित करके प्रेमदान करो। योग्य समय आने पर ही तुम व्रज में जाना।’ आकाशवाणी का आदेश पाकर ये लौटकर अपने स्थान पर आ गये और आकर अपने आसन पर पड़ गये।
(क्रमशः)

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