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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १२. माया का अंग)
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*॥ कर्तूती कर्म ॥*
*मरबे की सब ऊपजै, जीबे की कुछ नांहि ।*
*जीबे की जाणैं नहीं, मरबे की मन माँहि ॥६१॥*
निषिद्ध कर्मों के आचरण से जो आत्मा का पतन है, वह ही मृत्यु है । अतः सारे प्राणी निषिद्धाचरण करके आत्मपतनरूपी मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं । किन्तु पुण्य कर्मों को करके कोई भी अपनी उन्नति नहीं करता । उन्नति के साधन को भी नहीं जानते । प्रत्युत मन से निषिद्धाचरण के उपायों का ही विचार करते हैं । शुभ कर्म का नहीं । महाभारत में लिखा है कि- हे राजन् ! यह जीवात्मा अपने निकृष्ट पापों के कारण ही पापाचरण में प्रवृत्त होता है । इसलिये पाप ही बंध है और पाप ही निश्चय से नरक है ।
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*बंध्या बहुत विकार सौं, सर्व पाप का मूल ।*
*ढाहै सब आकार को, दादू येह स्थूल ॥६२॥*
अन्तःकरण के काम क्रोध आदि धर्मों से प्रेरित होकर यह स्थूल शरीर ही पापाचरण में प्रवृत्त होता है । अतः सब पापों का मूल कारण यह शरीर ही है । यह शरीर ही भोगों की आशा से पशुओं और मनुष्यों की हत्या करता है । अतः इस स्थूल शरीर का भी मनोनिग्रह की तरह निग्रह करना चाहिये ।
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*॥ काम ॥*
*दादू यह तो दोज़ख देखिये, काम क्रोध अहंकार ।*
*रात दिवस जरबौ करै, आपा अग्नि विकार ॥६३॥*
काम क्रोध अहंकार यह तीनों ही नरकतुल्य ही । अज्ञानी इन तीनों से ही दिन रात जलते रहते हैं । अहंकार तो महान् शत्रु है उसके रहते तो मुक्ति की वार्ता भी न हो सकती क्योंकि यह सबका कारण है और मुक्ति विरोधी है ।
गीता में- काम क्रोध लोभ ये तीनों ही नरक के द्वार हैं । अतः इनको त्याग दो ।
विवेकचूड़ामणि में कहा है कि- मुक्ति के प्रतिबन्धक और संसार के कारण अनेक देखे हैं । परन्तु अहंकार तो सबसे पहला मुक्ति का विरोधी है । जो अहंकार रूपी ग्राह से मुक्त है वह चन्द्रमा की तरह स्वयं प्रकाशपूर्ण आनन्द स्वरूप अपने स्वरूप को प्राप्त कर लेता है । अतः इन दोषों से बचना चाहिये ।
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*विषय हलाहल खाइ कर, सब जग मर मर जाइ ।*
*दादू मोहरा नाम ले, हृदय राखि ल्यौ लाइ ॥६४॥*
सभी प्राणी विषयों की आशारूपी विष को पी पीकर जन्मते मरते रहते हैं । किन्तु विषय विष को नष्ट करने वाले हरिनाम का चिन्तन नहीं करते हैं, उनके हृदय में विषय विष के पीने की इच्छा ही नहीं होती ।
भागवत् में लिखा है कि- हे माधव ! जो आपके भक्त आपके प्रेम से बंधे हुए हैं वे भक्तिमार्ग से कभी च्युत नहीं होते क्योंकि आप उनकी रक्षा करते रहते हैं । किन्तु वे आपके नाम के प्रभाव से विघ्नों के शिर पर पैर रखकर इस संसार में निर्भय विचरण करते रहते हैं ।
हे मानव भृंग ! व्यर्थ में ही तू संकार(अहंकार) क्यों कर रहा है । भगवान् के चरणकमलों का मकरन्दरस को चुपचाप क्यों नहीं पीता । उस चिदानन्दरूप जो संपूर्ण तृष्णा को मिटा देने वाला है, उसको एक बार भी याद तू पी लेगा तो तेरा सारा अहंकार(अभिमान) लीन हो जायेगा ।
(क्रमशः)

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