गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

*४. विरह कौ अंग ~ १२५/१२८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
https://www.facebook.com/DADUVANI
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
.
*४. विरह कौ अंग ~ १२५/१२८*
.
अलह बीम बीमा रतन, सोई बली दिलदार ।
कहि जगजीवन खोल दिल, साहिब दे दीदार ॥१२५॥ 
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु आगमन हेतु स्मरण की नींव हो जो बहुमूल्य हो और वह ही आधार हो ऐसा भवन हृदय को बना कर  रखें तभी प्रभु दर्शन होगें।
.
खिजमत२ कर खुसहाल रह, मालिक दरि महि ताज । 
कहि जगजीवन मौज लहै, सरि आवै सब काज२ ॥१२६॥
{२-२. यदि तुम प्रभु के सन्मुख रहते हुए प्रसन्न मन से उनकी सेवा(पूजा-अर्चना) करोगे तो तुम्हें निश्चय ही सुख प्राप्त होगा, तथा तुम्हारे छोटे बड़े सभी कार्य स्वतः सिद्ध होते जायेंगे ॥१२६॥}
संत जगजीवन जी कहते हैं, प्रभु की प्रसन्नता से सेवा में लगे रहें तो उसके द्वार से ही यश मान मिलेगा बादशाहत मिलेगी फिर आनंद ही आनंद है तुम्हारे सारे कार्य प्रभु की कृपा से हो जायेंगे।
.
कहि जगजीवन बिरह की, अगिनि जगाई रांम ।
दरद हमारा देखि हरि, दरसन दीजै रांम ॥१२७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि, हे प्रभु आपने विरह तो दे दिया आप से नेह के बाद जीव आपकी ही कामना कर विरह अग्नि से पीड़ित है। अब आप हमारी पीड़ा को देखकर दया कर दर्शन भी दीजिये।
.
काठ रचे सत करण को, सल मंहि पैठे धाइ ।
कहि जगजीवन रांमजी, तब हरि प्रगटै आइ॥१२८॥ 
संत जगजीवन जी कहते हैं कि सती होने हेतू जैसे चिता बनायी जाती है वैसे ही इस जीव ने  सब तैयारी कर ली है । कहते हैं ऐसा होता है कि जब सती सब संसार को छोड़कर अपने सत से प्रियतम के सानिध्य से विलग नहीं होने के कारण जीवित ही दहन को उद्यत होती है तो प्रभु स्वयं प्रकट होकर उसे अपनाते हैं यह ही अवस्था संत प्रभु प्रेमी जीव की बता रहे हैं।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें