गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

*६८. श्रीकृष्‍ण–लीलाभिनय*

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*साधु जन क्रीड़ा करैं, सदा सुखी तिहिं गाँव ।*
*चलु दादू उस ठौर की, मैं बलिहारी जाँव ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*६८. श्रीकृष्‍ण–लीलाभिनय*
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कवचिद रूदति वैकुण्‍ठचिंतासबलचेतन:।
क्‍वचिद्धसति तच्चिन्‍ताह्लाद उद्गायति क्‍वचित्॥
नदति क्‍वचिदुत्‍कण्‍ठो विलज्‍जो नृत्‍यति क्‍वचित्। क्‍वचित्तद्भावनायुक्‍तस्‍तन्‍मयोऽनुचकार ह॥[१]
([१] भगवत-प्रेम में पागल हुए भक्‍त की दशा का वर्णन करते हैं- कभी तो भगवत-चितंन से उसका हृदय क्षुब्‍ध-सा हो उठता है और भगवान वियोगजन्‍य दु:ख के स्‍मरण से वह रोने लगता है। कभी भगवत-चिं‍तन से प्रसन्‍न होकर उनके रूप-सुधा का पान करते-करते हंसने लगता है, कभी जोरों से भगवन्‍नामों का और गुणों का गान करने लगता है। कभी उत्‍कण्‍ठा के सहित हुंकार मारने लगता है, कभी निर्लज्‍ज होकर नृत्‍य करने लगता है और कभी-कभी वह ईश्‍वर-चिंतन में अत्‍यंत ही लवलीन होने पर तन्‍मय होकर अपने-आप ही भगवान की लीलाओं का अनुकरण करने लगता है। श्रीमद्भा. ७/४/३९-४०)
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यदि एक शब्‍द में कोई हमसे भक्‍त की परिभाषा पूछे तो हम उसके सामने ‘लोकबाह्म’ इसी शब्‍द को उपस्थित कर देंगे। इस एक ही शब्‍द में भक्‍त-जीवन की, भक्तिमार्ग के पवित्र पथ के पथिक की पूरी परिभाषा परिलक्षित हो जाती है।
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भक्‍तों के सभी कार्य अनोखे ही होते हैं। उन्‍हें लोक की परवा नहीं। बालकों की भाँति वे सदा आनन्‍द में मस्‍त रहते हैं, उन्‍हें रोने में भी मजा आता है और हंसने में भी आनन्‍द आता है। वे अपने प्रियतम की स्‍मृति में सदा बेसुध-से बने रहते हैं। जिस समय उन्‍हें कोई उनके प्‍यारे प्रीतम की दो-चार उलटी-सीधी बातें सुना दे, अहा, तब तो उनको आनन्‍द का कहना ही क्‍या है? उस समय तो उनके अंग-प्रत्‍यंगों में सभी सात्त्विक भावों का उदय हो जाता है। यथार्थ स्थिति का पता तो उसी समय लगता है।
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आइये, प्रेमावतार श्रीचैतन्‍य के शरीर में सभी भक्‍तों के लक्षणों का दर्शन करें। एक‍ दिन श्रीवास पण्डित के घर में प्रभु ने भावावेश में आकर ‘वंशी-वंशी’ कहकर अपनी वही पुरानी बांस की बांसुरी मांगी। कुछ हंसते हुए श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘यहाँ बांसुरी कहा? आपकी बांसुरी तो गोपिकाएँ हर ले गयी।’
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बस, इतना सुनना था कि प्रभु प्रेम में विह्वल हो गये, उनके सम्‍पूर्ण अंगों में सात्त्विक भावों का उद्दीपन होने लगा। वे गद्गदकण्‍ठ से बार-बार श्रीवास पण्डित कहते- ‘हाँ, सुनाओ। कुछ सुनाओ। वंशी की लीला सुनाते क्‍यों नही? उस बेचारी पोले बांस की बांसुरी ने उन गोपिकाओं का क्‍या बिगाड़ा था, जिससे वे उसे हर ले गयीं। पण्डित ! तुम मुझे उस कथा-प्रसंग को सुनाओ।’
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प्रभु को इस प्रकार आग्रह करते देखकर श्रीवास कहने लगे- ‘आश्विन का महीना था, शरद-ॠतु थी। भगवान निशानाथ अपनी सम्‍पूर्ण कलाओं से उदित होकर आकाशमण्‍डल को आलोकमय बना रहे थे। प्रकृति शांत थी, विहंगवृंद अपने-अपने घोंसलों में पड़े शयन कर रहे थे। वृंदावन की निकुंजों में स्‍तब्‍धता छायी हुई थी। रजनी की नीरवता की नाश करती हुई यमुना अपने नीले रंग के जल के साथ हुंकार करती हुई धीरे-धीरे बह रही थी।
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उसी समय मोहन की मनोहर मुरली की सुरीली तान गोपिकाओं के कानों में पड़ी।’ बस, इतना सुनना था कि प्रभु पछाड़ खाकर भूमि पर गिर पड़े और आँखों से अविरल अश्रु बहाते हुए श्रीवास पण्डित से कहने लगे- ‘हाँ, फिर क्‍या हुआ? आगे कहो। कहते क्‍यों नहीं? मेरे तो प्राण उस मुरली की सुरीली तान को सुनने के लिये लालायित हो रहे हैं।’
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श्रीवास फिर कहने लगे- ‘उस मुरली की ध्‍वनि जिसके कानों में पड़ी, जिसने वह मनमोहनी तान सुनी, वही बेसुध हो गयी। सभी अकी-सी, जकी-सी, भूली-सी, भटकी-सी हो गयीं। उन्‍हें तन-बदन की तनिक भी सुधि न रही। उस समय -
निशम्‍य गीतं तदनंगवर्धनं
व्रजस्त्रिय: कृष्‍णगृहीतमानसा:।
आजग्‍मुरन्‍योन्‍यमलक्षितोद्यमा:
स यत्र कान्‍तो जवलोलकुण्‍डला:॥
[२] श्रीमद्भा. १०/२९/४
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‘उस अनंगवर्धन करने वाले मुरली के मनोहर गान को सुनकर जिनके मन को श्रीकृष्‍ण ने अपनी ओर खींच लिया है, ऐसी उन गोकुल की गोपियों ने सापत्‍न्‍य-भाव से अपने अनेकों उद्योग को एक-दूसरी पर प्रकट नहीं किया। वे श्रीकृष्‍ण की उस जगन्‍मोहन तान में अधीन हुई जिधर से वह ध्‍वनि सुनायी पड़ी थी, उसी को लक्ष्‍य करके जैसे बैठी हुई थीं वैसे ही उठकर चल दीं। उस समय जाने की शीघ्रता के कारण उनके कानों के हिलते हुए कमनीय कुण्‍डल बड़े ही सुंदर मालूम पड़ते थे।’
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जो गौ दुह रही थी वह दुहनी को वहीं पटककर चल दी, जिन्‍होंने दुहने के लिये बछड़ा छोड़ दिया था, उन्‍हें उसे बांधन तक की भी सुध न रही। जो दूध औटा रही थीं वे उसे उफनता हुआ ही छोड़कर चल दीं। माता पुत्रों को फेंककर, पत्‍नी पतियों की गोद में से निकलकर, बहनें भाइयों को खिलाते छोड़कर उसी ओर को दौड़ने लगीं।
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श्रीवास कहते जाते थे, प्रभु भावावेश में सुनते जाते थे। दोनों ही बेसुध थे। इस प्रकार श्रीकृष्‍ण-कथा कहते-कहते ही सम्‍पूर्ण रात्रि बीत गयी। भगवान भुवनभास्‍कर भी घर के दूसरी ओर छिपकर इन लीलाओं का आस्‍वादन करने लगे।
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सूर्य के प्रकाश को देखकर प्रभु को कुछ बाह्यज्ञान हुआ। उन्‍होंने प्रेमपूर्वक श्रीवास पण्डित का जोरों से आलिंगन करते हुए कहा- ‘पण्डित जी ! आज आपने हमें देवदुर्लभ रस का आस्‍वादन कराया। आज आपके श्रीमुख से श्रीकृष्‍ण-लीलाओं के श्रवण से मैं कृतकृत्‍य हो गया।’
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इतना कहकर प्रभु नित्‍यकर्म से निवृत्त होने के लिये चले गये। दूसरे दिन प्रभु ने सभी भक्‍तों के सहित परामर्श किया कि सभी भक्‍त मिलकर श्रीकृष्‍ण-लीला का अभिनय करें। स्‍थान का प्रश्‍न उठने पर प्रभु ने स्‍वयं अपने मौसा पं० चन्‍द्रशेखर आचार्यरत्‍न का घर बता दिया।
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सभी भक्‍तों को वह स्‍थान बहुत ही अनुकूल प्रतीत हुआ। वह घर भी बड़ा था और वहाँ पर सभी भक्‍तों की स्त्रियाँ भी बिना किसी संकोच के जा-आ सकती थीं। भक्‍तों के यह पूछने पर कि कौन-सी लीला होगी और किस-किसको किस-किस पात्र का अभिनय कराना होगा, इसके उत्तर में प्रभु ने कहा- ‘इसका अभी से कोई निश्‍चय नहीं। बस यही निश्‍चय है कि लीला होगी और पात्रों के लिये आपस में चुन लो।
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पात्रों के पाठ का कोई निश्‍चय नहीं है। उस समय जिसे जिसका भाव आ जाय, वह उसी भाव में अपने विचारों को प्रकट करे। अभी से निश्‍चय करने पर तो बनावटी लीला हो जायगी। उस समय जैसी भी जिसे स्‍वाभाविक स्‍फुरता हो, यह सुनकर सभी भक्‍त बड़े प्रसन्‍न हुए। प्रभु के अन्‍तरंग भक्‍तों को तो अनुभव होने लगा मानो कल वे प्रत्‍यक्ष वृंदावन-लीला के दर्शन करेंगे।
(क्रमशः)

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