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*बाहर भीतर सर्व निरंतर,*
*सब में रह्या समाई ।*
परगट गुप्त, गुप्त पुनि परगट,*
*अविगत लख्या न जाई ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद.३७०)
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*६८. श्रीकृष्ण–लीलाभिनय*
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प्रभु ने उसी समय पात्रों का निर्णय किया। पात्रों के चुनने में भक्तों में खूब हंसी-दिल्लगी होती रही। सबसे पहले नाटक कराने वाले सूत्रधार का प्रश्न उठा। एक भक्त ने कहा- ‘सूत्रधार तो कोई ऐसा मोटा-ताजा होना चाहिये जो जरूरत पड़ने पर मार भी सह सके; क्योंकि सूत्रधार को ही सबकी देख-रेख रखनी होती है।’
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यह सुनकर नित्यानंद जी बोल उठे- ‘तो इस काम को हरिदास जी के सुपुर्द किया जावे। ये मार खाने में भी खूब प्रवीण हैं।’ सभी भक्त हंसने लगे, प्रभु ने भी नित्यानंद जी की बात का समर्थन किया। फिर प्रभु स्वयं ही कहने लगे- ‘नारद जी के लिये तो किसी दूसरे की जरूरत ही नहीं ! साक्षत नारदावतार श्रीवास पण्डित उपस्थित हैं ही।’
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इसी समय एक भक्त धीरे से बोल उठा- ‘नारदो कलहप्रिय:’ नारद जी तो लड़ाई-झगड़ा पसंद करने वाले हैं। इस पर हंसते हुए अद्वैताचार्य ने कहा- ‘ये नारद भगवान इससे अधिक और कलह क्या करावें? आज नवद्वीप में जो इतना कोलाहल और हो-हल्ला मच रहा है, इसके आदिकारण तो ये नारदावतार श्रीवास महाराज ही हैं।’
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इतने में ही मुरारी बोल उठा- ‘अजी, नारद जी को एक चेला भी चाहिये, यदि नारद जी पसंद करें तो मैं इनका चेला बन जाऊं।’ यह सुनकर गदाधर बोले- ‘नारद जी के पेट में कुछ दर्द तो हो ही नहीं गया है, जो हिंगाष्टक-चूर्ण के लिये वैद्य को चेला बनावें। उन्हें तो एक ब्रह्मचारी शिष्य चाहिये। तुम ठहरे गृहस्थी। तुम्हें लेकर नारद जी क्या करेंगे? उनके चेला तो नीलाम्बर ब्रह्मचारी बने ही बनाये हैं।’
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प्रभु ने मुसकराते हुए कहा- ‘भुवनमोहिनी लक्ष्मी देवी का अभिनय हम करेंगे। किंतु हमारी सखी ललिता कौन बनेगी?’ इस पर पुण्डरीक विद्यानिधि बोल उठे- ‘प्रभु की ललिता तो सदा प्रभु के साथ छाया की तरह रहती ही हैं। ये गदाधर जी ही तो ललिता सखी हैं।’
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इस पर सभी भक्तों ने एक स्वर में कहा- ‘ठीक है, जैसी अगूंठी वैसा ही उसमें नग जड़ा गया है।’ इस पर प्रभु हंसकर कहने लगे- ‘तब बस ठीक है, एक बड़ी बूढ़ी बड़ाई की भी हमें जरूरत थी सो उसके लिये श्रीपाद नित्यानन्द जी हैं ही।’ इतने में ही अधीर होकर अद्वैताचार्य बोल उठे- ‘प्रभो ! हमें एकदम भुला ही दिया क्या? अभिनय में क्या बूढे़ कुछ न कर सकेंगे।‘
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हंसते हुए प्रभु ने कहा- ‘आपको जो बूढ़ा बताता है, उसकी बुद्धि स्वयं बूढ़ी हो गयी है। आप तो भक्तों के सिरमौर हैं। दान लेने वाले वृन्दावन विहारी श्रीकृष्ण तो आप ही बनेंगे।’ यह सुनकर सभी भक्त बड़े प्रसन्न हुए। सभी ने अपना-अपना कार्य प्रभु से पूछा।
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बुद्धिमन्त खां और सदाशिव के जिम्मे रंगमंच तैयार करने का काम सौंपा गया। बुद्धिमन्त खाँ जमीदार और धनवान थे, वे भाँति-भाँति साज-बाज के सामान आचार्यरत्न के घर ले आये। एक ऊंचे चबूतरा पर रंगमंच बनाया गया। दायीं ओर स्त्रियों के बैठने की जगह बनायी गयी और सामने पुरुषों के लिये। नियत समय पर सभी भक्तों की स्त्रियाँ आचार्यरत्न के घर आ गयीं।
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मालिनी देवी और श्री विष्णुप्रिया के सहित शचीमाता भी नाटयाभिनय को देखने के लिये आ गयीं। सभी भक्त क्रमश: इकट्ठे हो गये। सभी भक्तों के आ जाने पर किवाड़ बंद कर दिये गये और लीला-अभिनय आरम्भ हुआ। भीतर बैठे हुए आचार्य वासुदेव पात्रों का रंगमंच पर भेजने के लिये सजा रहे थे।
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इधर पर्दा गिरा। सबसे पहले मंगलाचरण हुआ। अभिनय में गायन करने के लिये पांच आदमी नियुक्त थे। पुण्डरीक, विद्यानिधि, चन्द्रशेखर आचार्यरत्न और श्रीवास पण्डित के रमाई आदि तीनों भाई। विद्यानिधि का कण्ठ बड़ा ही मधुर था। वे पहले गाते थे। उनके स्वर में ये चारों अपना स्वर मिलाते थे।
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विद्यानिधि ने सर्वप्रथम अपने कोमल कण्ठ से इस श्लोक का गायन किया-
जयति जननिवासो देवकीजन्मवादो
यदुवरपर्षत्स्वैर्दोर्भिरस्यन्नधर्मम्॥
स्थिरचरवृजिनघ्न: सुस्मितश्रीमुखेन
व्रजपुरवनितानां वर्धयन् कामदेवम्॥[१]
([१] जो सब जीवों का आश्रय है, जिन्होंने कहने मात्र को देवकी के गर्भ से जन्म लिया, जिन्होंने सेवक समान आज्ञाकारी बड़े-बड़े यदुश्रेष्ठों के साथ अपने बाहुबल से अधर्म का संहार किया, जो चराचर जगत के दु:खों को दूर करने वाले हैं, जिनके सुन्दर हास्यशोभित श्रीमुख को देखकर व्रजबालाओं के हृदय में कामोद्दीपन हुआ करता था, उन श्रीकृष्ण की जय हो। श्रीमद्भा. १०/९०/४८)
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इसके अनन्तर एक और श्लोक मंगलाचरण में गाया गया, तब सूत्रधार रंग-मंचपर आया। नाटक के पूर्व सूत्रधार आकर पहले नाटक की प्रस्तावना करता है, वह अपने किसी साथी से बातों-ही-बातों में अपना अभिप्राय प्रकट कर देता है, जिस पर वह अपना अभिप्राय प्रकट करता है, उसे परिपार्श्वक कहते हैं।
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सूत्रधार(हरिदास)– ने अपने परिपार्श्वक(मुकुन्द)- के सहित रंगमंच पर प्रवेश किया। उस समय दर्शकों में कोई भी हरिदास जी को नहीं पहचान सकते थे, उनकी छोटी-छोटी दाढ़ों के ऊपर सुन्दर पाग बंधी हुई थी, वे एक बहुत लम्बा-सा अंगरखा पहने हुए थे और कंधेपर बहुत लंबी छड़ी रखी हुई थी।
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आते ही उन्होंने अपनी आजीविका प्रदान करने वाली रंगभूमि को प्रणाम किया और दो सुन्दर पुष्पों से उसकी पूजा करते हुए प्रार्थना करने लगे- ‘हे रंगभूमि ! तू आज साक्षात वृन्दावन ही बन जाओ’ इसके अनन्तर चारों ओर देखते हुए दर्शकों की ओर हाथ मटकाते हुए वे कहने लगे- ‘बड़ी आपत्ति है, यह नाटक करने का काम भी कितना खराब है। सभी के मन को प्रसन्न करना होता है। कोई कैसी भी इच्छा प्रकट कर दे, उसकी पूर्ति करनी ही होगी।’
(क्रमशः)

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