रविवार, 19 अप्रैल 2020

माया का अंग ४४.१/२-४७

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ १२. माया का अंग)
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*ता कारण हत आतमा, झूठ कपट अहंकार ।* 
*सो माटी मिल जायगा, बिसर्‍या सिरजनहार ॥४४.१/२॥* 
यह शरीर अनात्मा होता हुआ चेतन की तरह अज्ञानियों को प्रतीत हो रहा है । मूढों को मोहित करता है । क्षण में भी प्रसन्न होता जाता है थोड़े पदार्थ के न मिलने से दुःखी हो जाता है । अहो ! देह के तुल्य नीच गुणहीन कोई पदार्थ नहीं है । और अन्त में मर कर मिट्टी में मिल जाता है । ऐसे शरीर के लिये आत्मा को नहीं भूलना चाहिये । 
वासिष्ठ में लिखा है कि- समुद्र में बुदबुदे की तरह इसका विनाश क्षण में ही हो जाता है । सांसारिक कार्यों के लिये इधर-उधर दौड़ना ही इसमें भंवर पड़ रहा है । तथा इससे कोई स्वार्थ सिद्ध न होने से यह शून्य है और परमार्थ से शून्य होने के कारण यह निष्फल है । इस शरीर और जगत् में जिनकी आस्था है उनको मोह मदिरा से उन्मत्त समझना चाहिये और उनको बार-बार धिक्कार है । 
*॥ विरक्तता ॥* 
*दादू जन्म गया सब देखतां, झूठी के संग लाग ।* 
*साचे प्रीतम को मिले, भाग सके तो भाग ॥४५॥* 
हे साधक ! तेरा जन्म नाशवान् फलवाले मायिक भोगों में देखते देखते व्यर्थ ही चला गया । अब भी समय है तूं जितेन्द्रिय तथा परिवार के स्नेह बन्धन से रहित होकर सच्चे बन्धु परमात्मा को भज । 
महाभारत में लिखा है कि- दिन तो गिनते गिनते जा रहे हैं । आयु भी क्षीण हो रही है और प्रतिदिन और जीवन भी तेरा लिखा जा रहा है । जो तुझे आगे भोगना होगा । अतः खड़े हो जावो और परमात्मा को भजो । 
जैसे मेंढक कीचड़ में रहते-रहते वृद्ध होकर जल्दी ही नष्ट हो जाता है वैसे ही यह देह भी पंचकोष रूपी कीचड़ में डूबते उतरते वृद्ध हो जायेगा और पता ही नहीं है कि किसी प्रकार दुर्दशा को प्राप्त होकर गिरेगा । जैसे चंचल वायु धूलि उड़ाती किधर से भी निकल जाती है और पता भी नहीं चलता, ऐसे ही यह शरीर भी चंचल वायु की तरह राजस् कर्मों को करता हुआ किधर से चला जायेगा, पता भी नहीं चलेगा । अतः प्रभु को भजो । 
*दादू गतं गृहं, गतं धनं, गतं दारा सुत यौवनं ।* 
*गतं माता, गतं पिता, गतं बंधु सज्जनं ।* 
*गतं आपा, गतं परा, गतं संसार कत रंजनं ।* 
*भजसि भजसि रे मन, परब्रह्म निरंजनं ॥४६॥* 
हे साधक ! स्त्री पुत्र धन यौवन माता-पिता भाई बन्धु स्वजन सम्बन्धी परिवार यह सब उत्पन्न विनाशशील होने से नष्टप्रायः ही है । अतः शीघ्र उठकर(जागकर) भजन करो । अर्थात् इनकी ममता को त्याग दो । 
लिखा है कि- बिना ममता को त्यागे सुख नहीं मिल सकता, बिना ममता के त्यागे परमात्मा नहीं मिल सकता । अभयपद भी ममता के त्यागने से ही मिलता है, ममता त्यागते ही सभी सुखी हो जाते हैं । 
प्रायः कृपण मनुष्य को धनसुख नहीं दे सकता है । किन्तु उसकी आत्मा में ताप ही समाया रहता है कि इस धन की कैसे रक्षा करें । मरने के बाद वे नरक में भी जाते हैं । अतः धन की ममता व्यर्थ है और धन निन्दनीय भी माना है । 
मूढ मनुष्यों को ही स्त्री पुत्र परिवार आदि की ममता से सुखभासित होता है बुद्धिमान् मनुष्यों को तो सर्वत्र उपेक्षा बुद्धि(त्यागबुद्धि से) सुख होता है । अतः इनकी ममता करना उचित नहीं । 
अज्ञान दशा में स्त्री का सौन्दर्य कान्ति रूप यौवन अवस्था को देखकर आनन्द आता था वह अब ज्ञान होने पर तो ज्वर सा प्रतीत होता है । 
न इस लोक में सुख न है परलोक में जहां जहां जाकर देखता हूँ तो कुछ भी नजर नहीं आता । आत्मा के अलावा विचार कर देखने पर यह संसार भी मिथ्या ही प्रतीत होता है । अतः आत्मज्ञान प्राप्त करो । 
जीवन में विचार कर देखें तो सुख की अपेक्षा दुःख अधिक है । इन्द्रियों के विषयों में ममत्व तथा मोह के कारण अप्रिय लगने वाली मृत्यु ही हाथ पल्ले पड़ती है । इन सब की ममता त्यागकर भजन ही करना चाहिये । 
*॥ आसक्तता मोह ॥* 
*जीवों माँही जीव रहै, ऐसा माया मोह ।* 
*सांई सूधा सब गया, दादू नहीं अंदोह ॥४७॥* 
इस माया मोह को त्यागना बहुत कठिन है । इसको कोई त्याग ही नहीं सकता । सभी प्राणी स्त्री पुत्र धन धान्य आदि में आसक्त होकर यह नरजन्म जो प्रभु प्राप्ति का एक अवसर मिला था उसको व्यर्थ ही खो रहे हैं । इस की व्यर्थता का विचार करके कभी अपने मन में दुःख भी नहीं मानते कि हम अपने जीवन को व्यर्थ ही खो रहे हैं । यह शरीर भी क्षणभंगुर होने से अकस्मात् पागल की तरह जीव को मध्य में ही छोड़कर चला जाता है । अहो फिर भी प्राणी कुछ भी विचार नहीं करते यह एक माया का विलक्षण ही मोह है । 
महाभारत में लिखा है कि- इस मोहमय कडाह में सभी प्राणियों को सूर्य की अग्नि से रात दिन की लकड़ी जलाकर ऋतुरूपी चमची से हिलाता हुआ काल भगवान् पका रहा है । फिर भी कोई अचेत नहीं होता । इससे बढ़कर क्या आश्चर्य की वार्ता हो सकती है । यह माया पञ्चभूतों से रचित इस शरीर में सुखरूप तथा चैतन्य अखण्ड ज्ञान स्वरूप जीव का मोह पैदा कराकर इस संसार सागर में नितान्त घुमा रही है क्योंकि यह माया अघटित घटना में बड़ी ही चतुर है । 
(क्रमशः)

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