रविवार, 19 अप्रैल 2020

*४. विरह कौ अंग ~ १०९/११२*

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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ १०९/११२*
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कहि जगजीवन नौ लखौ, दरखत बड़ बिस्तार ।
बंदा बिलसै फूल फल, आसिक अल्लह लार७ ॥१०९॥
(७. लार-साथ में)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि, भक्ति रुपी वृक्ष का विस्तार बहुत विस्तृत है वह भली भांति फलित है, और इस भक्ति में प्रभु भी उसके सहायक हैं।
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कहि जगजीवन रांमजी, बिरहा उपजै आइ । 
भाव भगति दीदार लहै, रोम रोम सुख पाइ ॥११०॥
संत जगजीवन जी कहते हैं की हे प्रभु आपके नाम का विरह हो तो भाव पूर्ण भक्ति से दर्शन पाकर रोम रोम सुख पाये।
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बिरह जगावै रांमजी, हरि हरि बाणी रांम ।
कहि जगजीवन सारक्रित, सुत पढ़ि जाणैं धांम ॥१११॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु विरही शयन नहीं करता वह हरि सिमरण में लगा रहता है। संत कहते हैं कि वह शास्त्र पढकर ही भक्ति द्वारा प्रभु के धाम को जानते हैं।
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बिरह लगावौ रांमजी, करुणा करै पुकार ।
सुमरि सुमरि सनमुख रहै, सम्रथ सिरजनहार ॥११२॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि, हे राम जी इस जीव को कृपा कर आप विरह की अवस्था देवें, इसके लिये हम विनयपूर्वक करुण पुकार या करते हैं। बार बार स्मरण के प्रभाव से हे प्रभु जी आप सन्मुख रहें आप ही दर्शन देने में समर्थ हैं।
(क्रमशः)

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