रविवार, 19 अप्रैल 2020

*९०. महाप्रभु का प्रेमोन्‍माद और नित्‍यानन्‍दजी द्वारा दण्‍ड–भंग*

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*जे चित्त चहुँटै राम सौं, सुमिरण मन लागै ।*
*दादू आत्मा जीव का, संसा सब भागै ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*९०. महाप्रभु का प्रेमोन्‍माद और नित्‍यानन्‍दजी द्वारा दण्‍ड–भंग*
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पातालं वज्र याहि वासवपुरीमारोह मेरो: शिर:
पारावारपरम्‍परास्‍तर तथाप्‍याशा न शान्‍तास्‍तव ।
आधिव्‍याधिजरापराहत यदि क्षेमं निजं वाञ्छसि
श्रीकृष्‍णेति रसायनं रसय रे शून्‍यै: किमन्‍यै: श्रमै:॥[१]
([१] चाहे तू पाताल में चला जा, चाहे स्‍वर्ग में जाकर निवास कर, चाहे सुमेरु के शिखर पर चढ़कर वहाँ बैठ जा अथवा समुन्‍द्र से पार होकर किसी अपरिचित देश में चला जा। यह सब करने पर भी तेरी आशा शान्‍त न होगी। यदि तू सचमूच अपना कल्‍याण चाहता है, यदि वास्‍तव में तेरी आधि-व्‍याधि और जरा-मृत्‍यु के भय से बचने की इच्‍छा है, तो ‘श्रीकृष्‍णरुपी’ रसायन का सेवन कर। उसी से तेरे सम्‍पूर्ण रोग दूर हो जायँगे। अन्‍य व्‍यर्थ के उपायों से लगे रहने से क्‍या लाभ?)
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छत्रभोग में उस रात्रि को बिताकर प्रभु प्रात:काल अपने नित्‍यकर्म से निवृत हुए। उसी समय रामचन्‍द्र खाँ ने समाचार भेजा कि प्रभु को पार करने के लिये घाट पर नाव तैयार हैं। इस समाचार को पाते ही प्रभु अपने साथियों के सहित नाव पर जाकर बैठ गये।
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मल्‍लाहों ने नाव खोल दी, महाप्रभु आनन्‍द के सहित हरिध्‍व‍नि करने लगे। भक्‍तों ने भी प्रभु की ध्‍वनि में अपनी ध्‍वनि मिलायी। उस गगनभेदी ध्‍वनि की प्रतिध्‍वनि जल में सुनायी देने लगी। दसों दिशाओं में से वही ध्‍वनि सुनायी देने लगी। तब प्रभु ने मुकुन्‍द दत्त से संकीर्तन का पद गाने के लिये कहा।
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मुकुन्‍द अपने मीठे स्‍वर से गाने लगे-
हरि हरये नम: कृष्‍ण यादवाय नम:।
गोपाल गोविन्‍द राम श्रीमधुसूदन॥
अन्‍य भक्‍त भी मुकुन्‍द की ताल में ताल मिलाकर इसी पद का संकीर्तन करने लगे। महाप्रभु आवेश में आकर नाव में ही खड़े होकर नृत्‍य करने लगे।
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नौका नृत्‍य के वेग को न सह सकने के कारण डगमग-डगमग करने लगी। सभी मल्‍लाह घबड़ाने लगे कि हमारी नाव इस प्रकार के नृत्‍य से तो डूब जायगी। उन्‍होंने कहा- ‘सन्‍यासी बाबा ! हमारे ऊपर दया करो, उस पार पहुँचकर जी चाहे जितना नृत्‍य कर लेना। हमारी नाव को पार भी लगने दोगे या बीच में ही डुबा दोगे?’
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इस प्रकार मल्‍लाह कुछ क्षोभ के साथ दीन वचनों में प्रार्थना कर रहे थे, किन्‍तु महाप्रभु किसकी सुनने वाले थे। वे उनकी बातों को अनसुनी करके निरन्‍तर श्रीकृष्‍ण–कीर्तन करते ही रहे। तब तो नाविकों को बड़ा भारी आश्‍चर्य हुआ कि यह सन्‍यांसी हमारी बात तक नहीं सुनता और उसी प्रकार प्रेम में विह्वल होकर नृत्‍य कर रहा है।
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उन्‍होंने कुछ भय दिखाते हुए विवशता और कातरता के स्‍वर में कहा- ‘महाराज ! आप हमारी बात को मान जाइये। नाव में इस प्रकार उछल-उछलकर नृत्‍य करना ठीक नहीं है। आप देखते नहीं, उस पार घोर जंगल है, उसमें बड़े-बड़े खूंखार भेड़िये तथा जंगली सूअर रहते हैं। आपकी आवाज को सुनकर वे दौड़े आवेंगे, जल के भीतर मगर और घडियाल हैं, नदी में चारों ओर नावों पर चढ़कर डाकू चक्‍कर लगाते रहते हैं, वे जिसे भी पार होते देखते हैं, उसे ही लूट लेते हैं। कृपा करके आप बैठ जाइये और अपने साथ हमें भी विपत्ति के गाल में न डालिये।’
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उनकी ऐसी कातर वाणी सुनकर मुकुन्‍द दत्त आदि तो कीर्तन करने से बंद हो गये, किन्‍तु भला प्रभु कब बंद होने वाले थे। वे उसी प्रकार की‍र्तन करते ही रहे और अन्‍य साथियों को भी कीर्तन करने के लिये उत्‍साहित करने लगे। प्रभु के उत्‍साहपूर्ण वाक्‍यों को सुनकर फिर सब-के-सब कीर्तन करने लगे। धन्‍य हैं, ऐसे श्रीकृष्‍ण प्रेम को, जिसके आनन्‍द में प्राणों तक की भी परवा न हो।
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अमृत के सागर में डूबने का भय कैसा? श्रीकृष्‍ण नाम तो जीवों को आधि-व्‍याधि तथा सम्‍पूर्ण भयों से मुक्‍त करने वाला हैं। उसके सामने मगर, घड़ियाल, भेड़िया तथा डाकुओं का भय कैसा ? राम-नाम के प्रभाव से तो विष भी अमृत बन जाता है। हिंसक जन्‍तु भी अपना स्‍वभाव छोड़कर प्रेम करने लगते हैं।
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प्रभु को इस प्रकार कीर्तन में संलग्‍न देखकर नाविक समझ गये कि ये कोई असाधारण महापुरुष है, इन्‍हे कीर्तन से रोकना व्‍यर्थ हैं,जहाँ पर ये विराजमान हैं, वहाँ किसी प्रकार का अमंगल हो ही नहीं सकता। यही सोचकर वे चूप हो गये। फिर उन्‍होंने प्रभु से कीर्तन करने के लिये मना नहीं किया। प्रभु उसी प्रकार अपने अश्रुओं की धाराओं को गंगा जी के प्रवाह में मिलाते हुए कीर्तन करते रहे।
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उसी कीर्तन के समारोह में नाव प्रयाग घाट पर आ लगी। प्रभु ने अपने साथियों के सहित नाव से उतरकर प्रयागघाट पर स्‍नान किया और फिर आगे बढ़ें। अब उन्‍होंने गौड़-देश को छोड़कर उड़ीसा-देश की सीमा में प्रवेश किया। आज प्रभु ने अपने साथियों से कहा- ‘तुम लोग सब यहीं बैठो, आज मैं अकेला ही भिक्षा करने जाऊँगा।’
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प्रभु जी की बात को टाल ही कौन सकता था ? सबने इस बात को स्‍वीकार किया। प्रभु अपने रंगे वस्‍त्र को झोली बनाकर भिक्षा मांगने के लिये चले। यह हम पहले ही बता चुके हैं कि उड़ीसा तथा बंगाल में बने-बनाये अन्‍न की भिक्षा देने की परिपाटी नहीं है। अब तो कुछ-कुछ लोग सीखने भी लगे है। भट्टाचार्य ब्राह्मण संन्‍यासी को बने-बनाये सिद्ध अन्‍न की भिक्षा देने लगे हैं।
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पहले तो लोग सुखा ही अन्‍न भिक्षा में देते थे। ग्रामवासी स्‍त्री-पुरुष प्रभु की झोली में चावल दाल और चिउरा आदि डालने लगे। प्रभु जिसके भी द्वार पर जाकर ‘नारायण-हरि’ कहकर आवाज लगाते वही बहुत-सा अन्‍न लेकर उन्‍हें देने के लिये दौड़ा आता।
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उनके अद्भुत रुप-लावण्‍य को देखकर सभी स्‍त्री-पुरुष चकित रह जाते और एकटक भाव से प्रभु को ही निहारते रहते। उनके चेहरे में इतना अधिक आकर्षण था कि जो भी एक बार उनके दर्शन कर लेता वहीं अपना सर्वस्‍व प्रभु के ऊपर निछावर कर देने की इच्‍छा करता। जिसके घर में जो भी उत्तम पदार्थ होता, वही लाकर प्रभु की झोली में डाल देता।
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इस प्रकार थोड़ी ही देर में प्रभु की झोली भर गयी। विवश होकर कई आदमियों की भिक्षा लौटानी पड़ी। इससे प्रभु को भी कुछ दु:ख-सा हुआ। वे अपनी भरी हुई झोली को लेकर बाहर बैठे हुए अपने भक्‍तों के समीप आये। नित्‍यानन्‍द जी भरी हुर्इ झोली को देखकर हंसने लगे। अन्‍त में जगदानन्‍दजी ने प्रभु से झोली लेकर भोजन बनाया और सभी ने साथ बैठकर बड़े ही आनन्‍द के सहित उस महाप्रसाद को पाया।
(क्रमशः)

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