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*राम रसायन भर भर पीवै,*
*सदा सजीवन जुग जुग जीवै ॥*
*राम रसायन त्रिभुवन सार,*
*राम रसिक सब उतरे पार ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. ६०)
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*८९. पुरी के पथ में*
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इस प्रकार अम्बुलिंग घाट पर पहुँचकर प्रभु ने साथियों सहित स्नान किया और भक्तों को अम्बुलिंग शिव जी के सम्बन्ध में कथा सुनाने लगे। प्रभु ने कहा- जब महाराज भगीरथ स्वर्ग से गंगा जी को ले आये, तब उनके शोक में विकल होकर शिव जी यहाँ जल में गिर पडे। गंगा जी के प्रेम के कारण यहाँ शिव जी के प्रेम को जानती थीं, उन्होंने यहीं आकर शिव जी की पूजा की और जल में रहने की प्रार्थना की।
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गंगा जी के प्रेम के कारण यहाँ शिव जी जल में ही निवास करते हैं, इसीलिये ये अम्बुलिंग कहाते हैं, इनके दर्शन से कोटि जन्मों के पापों का क्षय हो जाता हैं।’ इस प्रकार शिव जी का माहात्म्य सुनाकर प्रभु फिर प्रेम में विह्रल होकर नृत्य करने लगे।
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उसी समय उस प्रान्त के शासक राजा रामचन्द्र खाँ भी वहाँ आ पहुँचे। इस बात को हम पहले ही बता चुके है कि गौड़ाधिपति की ओर से बड़े-बड़े लोगों को बहुत-से गांवों का ठेका दिया जाता था और उन्हें बादशाह की ओर से मजूमदार, खान अथवा राजा की उपाधि भी दी जाती थी। रामचन्द्र खां गौड़ाधिप के अधीनस्थ गौड़देशीय सीमा प्रान्त के ऐसे ही राजा थे।
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रामचन्द्र खां जाति के कायस्थ थे और शाक्त-धर्म को मानने वाले थे। उनका जीवन जिस प्रकार साधारण विषयी धनी पुरुषों का होता है, उसी प्रकार का था, किन्तु वे भाग्यशाली थे, जिन्हें महाप्रभु की थोड़ी-बहुत सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रभु के स्थान पर पधारने का समाचार सुनकर रामचन्द्र खां पालकी से उतरकर उनके दर्शन के लिये गये।
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उस समय आनन्द में विभोर हुए ‘महाप्रभु गदगद कण्ठ से कृष्ण का कीर्तन करते हुए रुदन कर रहे थे। रामचन्द्र खां प्रभु के तेज और प्रभाव से प्रभावान्वित हो गये और उन्होंने दूर से ही प्रभु के पादपद्मों में प्रणाम किया। किन्तु प्रभु तो बाह्यज्ञान शून्य हो रहे थे।
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वे तो चक्षुओं को आवृत करके प्रेमामृत का पान कर रहे थे। उन्हें किसी के नमस्कार-प्रणाम का क्या पता। प्रभु के साथियों ने प्रभु को सचेत करते हुए राजा रामचन्द्र खाँ का परिचय दिया। प्रभु ने उनका परिचय पाकर प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- ओह ! आपका ही नाम राजा रामचन्द्र खाँ है, आपके अकस्मात खूब दर्शन हुए !’
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दोनों हाथो को अंजलि बांधे हुए रामचन्द्र खाँ ने कहा- प्रभो ! इस विषयी कामी पुरुष को ही रामचन्द्र खाँ के नाम से पुकारते हैं। आज मैं अपने सौभाग्य की सराहना नहीं कर सकता, जो मुझ-जैसे संसारी गर्त में सने हुए विषयी पामर को आपके दर्शन हुए। आपके दर्शन से मेरे सब पाप क्षय हो गये। अब आप मेरे योग्य जो भी आज्ञा हो, उसे बताइये।’
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‘प्रभु ने कहा- ‘रामचन्द्र ! हम अपने प्राणवल्लभ से मिलने के लिये व्याकुल हो रहे हैं। पुरी में जाकर हम अपने हृदयमण के दर्शन करके जीवन को सफल बना सकें, तुम वैसा ही उद्योग करो। हमें घाट से उस पार पहुँचाने का प्रबन्ध करो। जिस प्रकार हम गंगा जी को पार कर सकें वही काम तुझे इस समय करना चाहिये।’
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हाथ जोड़े हुए रामचन्द्र खाँ ने कहा- ‘प्रभो ! इस युद्धकाल में गौड़देशीय लोगों को उस पार उतारना बड़ा ही कठिन कार्य हैं। बादशाह की ओर से मुझे कठिन आज्ञा है कि जिस किसी पुरुष को वैसे ही पार न उतारा जाय। फिर भी मैं अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी आपको पार उतारूँगा। आज आप कृपा करके यहीं निवास कीजिये, कल प्रात: मैं आपके पार होने का यथाशक्ति अवश्य ही प्रबन्ध कर दूँगा।’
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रामचन्द्र खाँ की बात को प्रभु ने स्वीकार कर लिया और छत्रभोग नगर में जाकर प्रभु ने एक भाग्यवान ब्राह्मण के यहाँ निवास किया। रात्रिभर प्रभु अपने साथियों के सहित संकीर्तन करते रहे। संकीर्तन की सुमधुर ध्वनि से वह सम्पूर्ण स्थान परम पावन बन गया। वहाँ पर चारों ओर भगवन्नाम की ही गूंज सुनायी देने लगी।
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प्रभु के संकीर्तन को सुनने के लिये छत्रभोग के बहुत से नर-नारी एकत्रित हो गये और वे भी प्रभु के साथ ताली बजा-बजाकर कीर्तन करने लगे। रामचन्द्र खाँ भी उस संकीर्तनरसामृत का आस्वादन करके अपने जीवन को धन्य किया। इस तरह रात्रि भर संकीर्तन के प्रमोद मे ही प्रभु ने वह रात्रि बितायी।
(क्रमशः)

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