बुधवार, 22 अप्रैल 2020

= *निरीहाई निर्वाण का अंग ११४(१/४)* =


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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*पाप पुण्य लिपै नहीं कबहूँ, द्वै पख रहिता सोई ।*
*धरणि आकाश ताहि तैं ऊपरि, तहाँ जाइ रत होई ॥*
*गुण आकार जहाँ गम नाहीं, आपै आप अकेला ।*
*दादू जाइ तहाँ जन जोगी, परम पुरुष सौं मेला ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*निरीहाई निर्वाण का अंग ११४*
इस अंग में इच्छा रहित व्यक्ति ही मुक्ति को प्राप्त होते हैं यह कह रहे हैं ~
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रज्जब पाई प्राण ने, नाम निरंतर लूटि ।
पाप पुण्य की ताखड़ी, गई हाथ सौं छूटि ॥१॥
प्राणी में निरन्तर नाम चिन्तन रूप नाम की लूट की तब इच्छा रहित स्थिति प्राप्त हुई है, जब इच्छा रहित स्थिति परिपाकावस्था को प्राप्त हुई तब पाप पुण्य का तुला अर्थात पाप-पुण्य का भेद अंत:करण रूप से गिर गया है ।
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पुण्य किये पुण्य पाव ही, देणे लेणा होय ।
रज्जब इहिं सौदे१ रहे२, शून्य समाने सोय ॥२॥
पुण्य करने से ही पुण्य प्राप्त होता है, दु:ख सुखादि देने से ही दु:ख सुखादि लेने पड़ते हैं किन्तु जो इच्छा रहित व्यक्ति उक्त व्यापार१ से रहित२ हो जाते हैं, वे सर्व विकार शून्य ब्रह्म में समा जाते हैं ।
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लेबे का लालच नहीं, नहिं देबे करतार१ ।
रज्जब अज्जब मुक्त मत२, जीव ब्रह्म उणहार३ ॥३॥
जिनमें ईश्वर१ से लेने का भी लोभ नहीं है और देने का भी विचार नहीं है, उन मुक्त पुरुषों का सिद्धान्त२ बड़ा अदभुत है, इस अवस्था में जीव ब्रह्म के समान३ ही हो जाता है ।
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भली बुरी भावै नहीं, परसे पाप न पुण्य ।
सो रज्जब राम हिं मिले, सहज समाने शून्य ॥४॥
जिसको भली और बुरी दोनों ही व्यक्ति, वस्तु आदि प्रिय नहीं होती और जिसके अन्त:करण को पाप-पुण्य दोनों ही स्पर्श नहीं करते वह इच्छा रहित व्यक्ति राम को प्राप्त होकर सहज शून्य ब्रह्म में ही समा जाता है, यही निर्वाण है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित निरिहाई निर्वाण का अंग ११४ समाप्तः ॥सा. ३५०५॥
(क्रमशः)

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