बुधवार, 22 अप्रैल 2020

= २५१ =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷 
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग सिन्दूरा १०(गायन समय रात्रि १२ से ३)* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
२५१ - झपताल
हरि भजतां किमि भाजिये, भाजैं भल नांहीं ।
भागें भल क्यों पाइये, पछतावै माँहीं ॥टेक॥
सूरो सो सहजैं भिड़ै, सार उर झेलै ।
रण रोकै भाजै नहीं, ते बाण न मेलै ॥१॥
सती सत सांचा गहै, मरणै न डराई ।
प्राण तजे जग देखताँ, पियड़ो उर लाई ॥२॥
प्राण पतँगा यों तजै, वो अँग न मोड़ै ।
जौबन जारे ज्योति सौं, नैना भल जोड़ै ॥३॥
सेवक सो स्वामी भजै, तन मन तज आसा ।
दादू दर्शन ते लहैं, सुख संगम पासा ॥४॥
हरि भजन करते समय विषयाशा पूर्ति के लिए नहीं दौड़ना चाहिए, उधर दौड़ने से भजन भली प्रकार नहीं होता । भक्त को विषयाशा पूर्ति के लिए दौड़ने से भलाई कैसे मिलेगी, प्रत्युत मन में पश्चात्ताप करना होगा । 
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वीर तो वही है, जो सहजावस्था के द्वारा महा मोह को नष्ट करने के लिए युद्ध करता है और ब्रह्म सम्बन्धी गुरु के सार वचन रूप शस्त्रों को छाती पर झेलता है । साधन संग्राम में कामादि को रोकता है अर्थात् अपने हृदय में उनके वेग को नहीं आने देता । न साधन से हटता है और उक्त ब्रह्म सम्बन्धी गुरु वचन रूप बाण अन्त:करण हाथ से दूर नहीं धरता । 
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सती नारी पति से प्रेम करके सच्चा सत्य ग्रहण करती है तब मरणे से नहीं डरती । जगत् के लोगों को देखते - देखते पति के शव को हृदय से लगा कर प्राण छोड़ देती है, तब ही पति - लोक को प्राप्त होती है । 
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इसी प्रकार पतँग अपने प्राणों को त्याग देता है, वह दीपक से अपने शरीर को नहीं लौटाता, भली प्रकार अपने नेत्र दीपक से जोड़कर उसी की ज्योति से अपने यौवन युक्त शरीर को जला देता है । 
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वैसे ही तन और मानसिक सुखों की आशा को त्याग कर जो भगवान् को भजता है, वही सेवक स्वामी के दर्शन करता है और उनके अभेद रूप संगम का आनँद लेता है ।
(क्रमशः)

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