मंगलवार, 7 अप्रैल 2020

सुषिम जन्म कौ अंग ९, माया का अंग १/३

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श्रीदादूवाणी भावार्थदीपिका भाष्यकार - ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर स्वामी आत्माराम जी महाराज, व्याकरणवेदान्ताचार्य ।
साभार विद्युत संस्करण ~ रमा लाठ
*हस्तलिखित वाणीजी* चित्र सौजन्य ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
(श्री दादूवाणी ~ ११. सुषिम जन्म कौ अंग/१२. माया का अंग)
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*॥करणी बिना कथणी॥*
*शूकर स्वान सियाल सिंह, सर्प रहैं घट मांहि ।*
*कुंजर कीड़ी जीव सब, पांडे जाणै नांहि ॥९॥*
लेकिन जीव यह नहीं जानता कि मैं पशुतुल्य हो गया हूँ । यह ही जीव की मूर्खता है और मूर्खता ही सब दुःखों की जननी है । 
वासिष्ठ में कहा है कि- हे महात्मन् मूर्खता ही परम बन्धन है, ऐसा जानो और मैं वृद्ध नहीं हूँ, ऐसा अपने मन में जानना ही मुक्ति है । मैं सदा बद्ध हूँ ऐसा मानना ही मूर्खता है । जो मूर्खता है वह ही परमबन्धन है । अतः अपनी मुक्ति के लिये अध्यात्म अधिभूत अधिदैव ये तीन प्रकार की सृष्टि त्रिजगन्मय आत्मा से ही उत्पन्न हुई है । ऐसा जानो । ऐसा ज्ञान होने पर तुम सदा ही मुक्त हो । 
इति सूक्ष्म जन्म का अंग सम्पूर्ण ॥अंग ११॥साखी ९॥
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*अथ माया का अंग १२~मंगलाचरण*
*दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरुदेवतः ।*
*वंदनं सर्व साधवा, प्रणामं पारंगतः ॥१॥*
*साहिब है पर हम नहीं, सब जग आवै जाइ ।*
*दादू सपना देखिये, जागत गया बिलाइ ॥२॥*
ब्रह्म ही सत्य है । क्योंकि उसका तीनों कालों में बाध नहीं होता है । बाकी सारा जगत् मिथ्या है । उत्पन्न होता है और नष्ट होता है । जैसे स्वप्न के पदार्थ स्वप्नकाल में तो सत्य की तरह प्रतीत होते हैं परन्तु जागने पर वे ही असत्य प्रतीत होते हैं । ऐसे ही ब्रह्मज्ञान होने पर सब जगत् असत्य प्रतीत होता है । अतः मिथ्या माया को त्यागकर साधक को सत्यब्रह्म का ही ध्यान करना चाहिये । 
विवेकचूड़ामणि में कहा है कि- जीव ब्रह्म की एकता को जानकर मन की अखण्ड ब्रह्माकार वृत्ति से ब्रह्म में तन्मय होकर ब्रह्मानन्द रस का पान करो, बाकी अत्यन्त शून्य भ्रम जाल से क्या लेना देना है ।
प्रश्न- माया किसको कहते हैं ? 
उत्तर- अविद्या प्रकृति माया ये माया के नाम हैं । जो ब्रह्म को आच्छादित कर लेती है उसको अविद्या कहते हैं । 
विपरीत बुद्धि को जो पैदा करने वाला है, उसको अध्यास कहते हैं । यह अविद्या और अध्यास का भेद है । अथवा क्रियाकारक का फल इनमें जो भेद करने वाली है उसको अविद्या कहते हैं । जीव और आत्मा की एकता करने वाली को विद्या कहते हैं । 
वेदान्तसन्दर्भ में लिखा है कि- उपमारहित, नित्य, निरंश, अखण्ड, चैतन्य स्वरूप सब विकलपों से रहित, ब्रह्म में भी जो जीव ईश्वर का भेद पैदा कर देती है तथा अघटित घटना में चतुर है उसी को माया कहते हैं । 
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*दादू माया का सुख पंच दिन, गर्व्यो कहा गँवार ।*
*सपने पायो राज धन, जात न लागे बार ॥३॥*
स्वप्न के सुख की तरह मायिक सुख भी मिथ्या तथा क्षणिक होने के कारण गर्व करने योग्य नहीं है । जैसे किसी को स्वप्न में राजधन मिल जाय तो वह जैसे जागने पर नष्ट हो जाता है वैसे ही मायिक पदार्थों का सुख भी क्षणभँगुर होने से देखते ही नष्ट हो जाता है । उसका क्या गर्व करें । 
भगवान् शंकारचार्य लिख रहे है कि- धन यौवन आदि का गर्व मत करो क्योंकि काल भगवान् निमेष मात्र में इनको नष्ट कर देते हैं । सारे जगत को मायामय जानकर सबको त्याग दो और अपने को ब्रह्म जानकर उसमें प्रविष्ट हो जावो । जैसे नदी के तट पर स्थित वृक्ष का अहंकार करने के कारण शीघ्र ही पतन हो जाता है । वैसे ही मनुष्य अहंकार करता है वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । नम्र रहनेवाले की अभिवृद्धि होती है । इस प्रकार गुणदोष के विचार में निपुण मनुष्य अहंकार के दोष को जानकर अहंकार नहीं करता ।
मूर्ख मनुष्य अपने से अधिक गुणवान् को देखकर तथा अपने से हीन को देखकर हृदय में ईर्ष्या अभिमान करता है और विद्वान अहंकार को त्याग देता हैं । सिद्धांत को जानने के कारण शुद्धबुद्धि वाले विद्वान ऐसा कहा करते हैं । मित्र, क्षेत्र, धन, पुत्र आदि संपदा को स्वप्न तथा इन्द्रजाल के खेल की तरह पांच या तीन दिन का ही समझो ।
(क्रमशः)

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