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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू चिन्ता राम को, समर्थ सब जाणै ।*
*दादू राम संभाल ले, चिंता जनि आणै ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*विश्वास संतोष का अंग ११२*
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असमान१ जमीं३ अम्बर२ अर्पि, आभे५ भार अठार४ ।
बागे५ वे ब्रह्मण्ड को, पिंडहिं कहा विचार ॥३३॥
भगवान आकाश१ को बादल२ रूप वस्त्र देते हैं, पृथ्वी३ को अठारह४ भार वनस्पति रूप वस्त्र५ देते हैं, प्रभु जब सभी ब्रह्माण्ड को वस्त्र देते हैं, तब मनुष्य देह को देंगे या नहीं देंगे ? इसका विचार ही क्या करना ?
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नौ निधि जाके नाम में, सब संतन की साखि१ ।
जन रज्जब सौं सुमरिये, कहा करै वित२ राखि ॥३४॥
जिस प्रभु के नाम में नव निधि है, उन प्रभु का स्मरण करना चाहिये, यही सब सन्तों की साक्षी१ है, केवल धन२ का संग्रह ही क्या करेगा ?
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दह१ दिशि देवे को खड़ा, दीनानाथ दयाल ।
रज्जब यूं जाण्या कटे, वित बंधन के साल ॥३५॥
दीनानाथ दयालु परमात्मा अन्न-वस्त्रादि देने के लिये दशों१ दिशाओं में खड़े हैं, ऐसा जानने से ही धन में असक्ति रूप बंधन का दु:ख कटता है ।
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वैरागी वित क्या करै, जो विश्वासी होय ।
रज्जब मच्छी मसक सौं, जलहि न जोया१ कोय ॥३६॥
विशाल मच्छ को मशक के जल से अनुरक्त होता कोई नहीं देखता१ वैसे ही यदि ईश्वर विश्वासी विरक्त हो तो वह धन का क्या करेगा ?
(क्रमशः)

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