रविवार, 19 अप्रैल 2020

= २४८ =


🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷 
*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द* 
*राग सिन्दूरा १०(गायन समय रात्रि १२ से ३)* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
२४८ - शूलताल
अविनाशी संग आत्मा, रमै हो रैण दिन राम ।
एक निरँतर ते भजैं, हरि हरि प्राणी नाम ॥टेक॥
सदा अखँडित उर बसै, सो मन जाणी ले ।
सकल निरँतर पूरि सब, आतम रातो ते ॥१॥
निराधार निज बैसणों, जिहिं तत आसन पूर ।
गुरु शिष आनँद ऊपजै, सन्मुख सदा हजूर ॥२॥
निश्चल ते चालै नहीं, प्राणी ते परिमाण ।
साथी साथैं ते रहें, जाणैं जाण सुजाण ॥३॥
ते निर्गुण आगुण१ धरी, माँहीं कौतुकहार ।
देह अछत२ अलगो रहे, दादू सेव अपार ॥४॥
जो प्राणी हरि हरि उच्चारण करते हुये निरँतर एक अविनाशी राम को भजते हैं, उनकी बुद्धि रात्रि - दिन उस राम में ही रमण करती है । 
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जो सदा अखँडित भाव से हृदय में बसता है, उसी को साधन सम्पन्न मन से जान कर प्राप्त कर ले । जो निरँतर सब में परिपूर्ण है, उसी में हमारा जीवात्मा अनुरक्त है, 
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जब उस निराधार निज स्वरूप तत्व में स्थिति रूप आसन लगा कर बैठना होता है, तब ब्रह्म तत्व सदा सन्मुख उपस्थित भासता है और गुरु शिष्य दोनों के हृदय में ब्रह्मानँद उत्पन्न होता है । 
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वे साधक सँयम रूप माप से स्वस्वरूप में निश्चल रहते हैं, उनकी वृत्ति विषयों में नहीं जाती । वे बुद्धिमान् ज्ञान द्वारा जानकर अपने सदा के साथी परब्रह्म के साथ ही रहते हैं । 
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वे गुण - विस्तार वाली - माया१ को त्याग कर सत्ता मात्र से सँसार रूप खेल रचने वाले निर्गुण ब्रह्म में ही स्थित रहते हैं । इस प्रकार उस असीम प्रभु की उपासना करके शरीर में रहते हुये भी शरीराध्यास२ से अलग रहते हैं ।
(क्रमशः)

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