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*समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि ।*
*सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*विश्वास संतोष का अंग ११२*
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वस्तु न मिले विश्वास बिन, बहु विधि करो उपाय ।
रज्जब रती१ न पाइये, भावै२ दह३ दिशि जाय ॥८५॥
बहुत प्रकार के उपाय करने पर भी विश्वास के बिना ब्रह्म-वस्तु नहीं मिलती, चाहे२ दशों दिशाओं में जाय, तो भी विश्वास के बिना ब्रह्म का किंचित१ भी ज्ञान नहीं होता ।
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जे हिरदै विश्वास ह्वै, तो हरि हिरदा माँहिं ।
जन रज्जब विश्वास बिन, बाहर भीतर नाँहिं ॥८६॥
यदि हृदय में हरि का विश्वास है तो हरि हृदय में ही स्थित है और विश्वास नहीं है तो बाहर-भीतर दोनों स्थानों में ही नहीं भासते ।
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पेट भरै बहु पाप करि, पापी प्राणि अनेक ।
अशन१ वसन२ आरंभ३ बिन, आतम लहै सु एक ॥८७॥
अनेक पापी प्राणी बहुत से पाप करके पेट भरते हैं, कोई एक विश्वास युक्त जीवात्मा ही बिना किसी उद्योग३ के भोजन१-वस्त्र२ प्राप्त करता है ।
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अविश्वास आरम्भ करि, मग१ मग लेहि अहार ।
अशन वशन विश्वास बिच, निष्कामी व्यवहार ॥८८॥
बिना विश्वास के कार्यारम्भ करके विविध उपाय रूप मार्ग१ में जाकर भी भोजन ही प्राप्त करते हैं और निष्कामी के भोजन-वस्त्रादि व्यवहार विश्वास में वृति रहने से ही हो जाता है ।
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आश निराशी अशन१ का, सुन हु विवेक बोल२ ।
पड़ै पंचमुख३ पिंजरै, पन्नग४ पिटारे खोल ॥८९॥
सिंह३ को पिंजरे में ही भोजन१ डाला जाता है, सर्प४ को पिटारा खोल के दुध पिलाते हैं, वैसे ही विवेकियों के वचन२ सुनो, उनसे तुम भी भोजन की आशा से रहित यथा लाभ में सन्तुष्ट हो जाओगे ।
(क्रमशः)

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