गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

= *विश्वास संतोष का अंग ११२(१७/२०)* =

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू हौं बलिहारी सुरति की, सबकी करै सँभाल ।*
*कीड़ी कुंजर पलक में, करता है प्रतिपाल ॥*
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*श्री रज्जबवाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत संस्करण ~ महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी
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*विश्वास संतोष का अंग ११२*
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रज्जब मोटे मच्छ अति, सौ योजन सु शरीर ।
तेउ पेट पूरण भरै, तो गह विश्वास मन वीर१ ॥१७॥
जिनके सौ सौ योजन शरीर है, ऐसे विशालकाय मच्छ है, उनके भी पेट प्रभु पूरण रूप से भरते हैं तब हे भाई१ ! मन उन प्रभु का विश्वास ग्रहण कर ।
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भजन विमुख भोजन लहै, चौरासी लख जूणि१ ।
तो रज्जब सुमिरण सहित, तिनको कैसे ऊंणि२ ॥१८॥
चौरासी लाख योनियों१ के जीव हरि भजन से विमुख रहकर भी भोजन प्राप्त करते हैं ? तब जो प्रभु का स्मरण करते हैं, उनको क्या कमी२ रह सकती है ।
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अशन१ अकाशि असंख्य को, पाताली पूरि प्रसाद ।
महि सु मुकता करि धरया, सु तुझे न करसी याद ॥१९॥
आकाश में रहने वाले असंख्य अनल पक्षियों को और पाताल मे रहने वाले सर्पादि को परिपूर्ण से प्रभु प्रसाद देते हैं, पृथ्वी के प्रणियों के लिये भी उसने बहुत सा भोजन१ तैयार करके धरा है वह तुझे याद न करेगा क्या ?
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असंख्यक लोक ब्रह्माण्ड के, उदर उदधि१ नीवाण२ ।
रज्जब पूरै३ ठौर सब, तुझे न देई खाण४ ॥२०॥
ब्रह्माण्ड के असंख्यक लोको के भी समुद्रादि१ जलाशय२ रूप पेट है, वे प्रभु सब ठौर सभी को भोजन४ देते३ हैं, फिर तेरे को भोजन नहीं देंगे क्या ?
(क्रमशः)

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