गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

= २३१ =

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*श्री दादू अनुभव वाणी, द्वितीय भाग : शब्द*
*राग आसावरी ९ (गायन समय प्रात: ६ से ९)*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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२३१ - समता ज्ञान । ललित ताल
बाबा, कहु दूजा क्यों कहिये, 
तातैं इहि सँशय दुख सहिये ॥टेक॥
यहु मति ऐसी पशुवाँ जैसी, काहे चेतत नाँहीं ।
अपना अँग आप नहिं जानैं, देखै दर्पण माँहीं ॥१॥
इहि मति मीच मरण के ताँई, कूप सिंह तहं आया ।
डूब मुवा मन मरम न जान्या, देखि आपनी छाया ॥२॥
मद के माते समझत नाहीं, मैगल१ की मति आई ।
आपै आप आप दुख दीया, देख आपणी झांई ॥३॥
मन समझै तो दूजा नाँहीं, बिन समझें दुख पावै ।
दादू ज्ञान गुरु का नाहीं, समझ कहां तैं आवै ॥४॥
२३१ - २३२ में समत्व ज्ञान बिना क्लेश होता है, यह कह रहे हैं - बाबा कहो, द्वैत क्यों कहा जाय ? इस द्वैत के कहने से ही तो इस सँसार में सँशय जन्य क्लेश सहा जाता है । 
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यह द्वैत बुद्धि पशुओं की बुद्धि के समान है । इससे क्यों नहीं सावधान होता ? श्वान दर्पण में देखता है, तब अपने शरीर को भी नहीं पहचानता और भूँक २ कर मर जाता है । 
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इस भेद बुद्धि से ही तो शशक के कहने पर मृत्यु के वश होकर मरणे के लिये वहां कूप पर सिंह आया और अपनी छाया को देखकर अपने मन में उस रहस्य को न जान सका, इसलिये कूप में कूद कर डूब मरा । 
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मद से मस्त हाथी१ समझता नहीं, चमकीले पत्थर में अपनी ही छाया को देख, दूसरा हाथी जानकर, उस पर आघात करके अपने आप ही अपने को दु:ख देता है, वैसे ही हाथी की सी द्वैत बुद्धि आने पर प्राणी अपने को आप ही दु:खी कर लेता है । 
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मन में समझे तो द्वैत है ही नहीं, किन्तु बिना ही समझे दु:ख पाते हैं । जब गुरु का ज्ञान सुनते ही नहीं तब समझ भी कहां से आये ?
(क्रमशः)

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