सोमवार, 6 अप्रैल 2020

*३. नांम कौ अंग ~ २१७/२०*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🙏🌷
*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*३. नांम कौ अंग ~ २१७/२०*
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मांहि भजन की कल्पना, खरी व्याप्रीति३ मांहि ।
जगजीवन इक रांम बिन, आंन सुहावै नांहि ॥२१७॥
{३. व्याप्रिति-व्याप्रिति(कर्म)}
संतजगजीवन जी कहते हैं कि अतंर में भजन विषयक सोच हो और
कर्म भी हरि भजन ही हो संत कहते हैं कि प्रभुनाम के बिना कोइ
अन्य न भावे जिन्हें वे ही सच्चे साधक हैं।
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रांम नांम जिन कै विभौ४, सुमिरण प्रेम विलास ।
अनंत भोग अबिगत भजन, सु कहि जगजीवनदास ॥२१८॥
(४. विभौ-वैभव, धन)
संतजगजीवन जी कहते हैं कि जो अपना धन वैभव ही राम को मानते हैं, ऐसे साधक जन जिनका विलास या शौक ही प्रेम व स्मरण है वे न जाने कितनी विधाओं से भजन कर अनंत वांछित भोगों को सुंदर प्रकार से प्राप्त करते हैं।
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कोई जन जंगल रहै, कोई रहै घर छाइ ।
जगजीवन हरि मैं रहै, गोबिन्द का गुन गाइ ॥२१९॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि कोइ जन जंगल में रहते हैं कोइ घर में ही व्यस्त रहते हैं संत तो हरि भजन में ही मस्त रहते हैं।
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अलख प्राण अबिगत सुरति, मन ही सजीवन रांम ।
मनसा हरि हरि सबद मंहि, जगजीवन भजि रांम ॥२२०॥
संतजगजीवन जी कहते हैं कि वे दृष्टि से परे ध्यान से भी उंचे जो प्रभु हैं उन हरि जी का स्मरण हरि शब्द से करें और राम स्मरण में रत रहें।
(क्रमशः)

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