गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

*तीव्र वैराग्य तथा बद्ध जीव*

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*ज्यूं जल पैसे दूध में, ज्यूं पाणी में लौंण ।*
*ऐसे आत्मराम सौं, मन हठ साधै कौंण ॥*
*(श्री दादूवाणी ~ स्मरण का अंग)*
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*साभार ~ श्रीरामकृष्ण-वचनामृत{श्री महेन्द्रनाथ गुप्त(बंगाली), कवि श्री पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’(हिंदी अनुवाद)}*
साभार विद्युत् संस्करण ~ रमा लाठ
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(३)
असंशयं महाबाहो मानो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ।। (गीता, ६/३५)
*तीव्र वैराग्य तथा बद्ध जीव* 
विजय- बद्ध जीवों के मन की कैसी अवस्था हो तो मुक्ति हो सकती है ?
श्रीरामकृष्ण- ईश्वर की कृपा से तीव्र वैराग्य किसे कहते हैं? ‘बनत बनत बनि जाई’, ‘चलो राम भजो’, यह सब मन्द वैराग्य है । जिसे तीव्र वैराग्य होता है उसके प्राण भगवान् के लिए व्याकुल रहते हैं, जैसे अपनी कोख के बच्चे के लिए माँ व्याकुल रहती है । जिसको तीव्र वैराग्य होता है वह भगवान् को छोड़ और कुछ नहीं चाहता । संसार को कुआँ समझता है, उसे जान पड़ता है कि अब डूबा । आत्मीयों को वह काला नाग देखता है, उनके पास से उसकी भागने की इच्छा होती है और भागता भी है । ‘घर का काम पूरा कर लें तब ईश्वर की चिन्ता करेंगे’, यह उसके मन में आता ही नहीं । भीतर बड़ी जिद रहती है ।
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“तीव्र वैराग्य किसे कहते हैं, इसकी एक कहानी सुनो । किसी देश में एक बार वर्षा कम हुई । किसान नालियाँ काट-काटकर दूर से पानी लाते थे । एक किसान बड़ा हठी था । उसने एक दिन शपथ ली कि जब तक पानी न आने लगे, नहर से नाली का योग न हो जाए, तब तक बराबर नाली खोदूँगा । इधर नहाने का समय हुआ । उसकी स्त्री ने लड़की को उसे बुलाने भेजा । लड़की बोली, ‘पिताजी, दोपहर ढल गयी, चलो तुमको माँ बुलाती है । उसने कहा, ‘तू चल, हमें अभी काम है ।’ 
दोपहर ढल गयी, पर वह काम पर डटा रहा । नहाने का नाम न लिया । तब उसकी स्त्री खेत में जाकर बोली, ‘नहाओगे कि नहीं? रोटियाँ ठण्डी हो रही हैं । तुम तो हर काम में हठ करते हो । काम कल करना या भोजन के बाद करना ।’ गालियाँ देता हुआ कुदाल उठाकर किसान स्त्री को मारने दौड़ा बोला, ‘तेरी बुद्धि मारी गयी है क्या? देखती नहीं कि पानी नहीं बरसता; खेती का काम सब पड़ा है; अब की बार लड़के-बच्चे क्या खाएँगे? सब को भूखों मरना होगा । हमने यही ठान लिया है कि खेत में पहले पानी लायेंगे, नहाने-खाने की बात पीछे होगी ।’ 
मामला टेढ़ा देखकर उसकी स्त्री वहाँ से लौट पड़ी । किसान ने दिनभर जी तोड़ मेहनत करके शाम के समय नहर के साथ नाली का योग कर दिया । फिर एक किनारे बैठकर देखने लगा, किस तरह नहर का पानी खेत में ‘कलकल’ स्वर से बहता हुआ आ रहा है, तब उसका मन शान्ति औत आनन्द से भर गया । घर पहुँचकर उसने स्त्री को बुलाकर कहा, ‘ले आ अब डोल और रस्सी ।’ स्नान भोजन करके निश्चिन्त होकर फिर वह सुख से खुर्राटे लेने लगा । जिद यह है और तीव्र वैराग्य की उपमा है ।
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“खेत में पानी लाने के लिए एक और किसान गया था । उसकी स्त्री जब गयी और बोली, ‘धूप बहुत हो गयी, चलो अब, इतना काम नहीं करते’, तब यह चुपचाप कुदाल एक ओर रखकर बोला, ‘अच्छा, तू कहती है तो चलो ।’ (सब हँसते हैं ।) वह किसान खेत में पानी न ला सका । यह मन्द वैराग्य की उपमा है ।
“हठ बिना जैसे किसान खेत में पानी नहीं ला सकता, वैसे ही मनुष्य ईश्वरदर्शन नहीं कर सकता ।”
(क्रमशः)

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