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*कोई नहिं करतार बिन, प्राण उधारणहार ।*
*जियरा दुखिया राम बिन, दादू इहि संसार ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*१०८. दक्षिण के तीर्थों का भ्रमण (२)*
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परोपकृतिकैवल्ये तोलयित्वा जनार्दन:।
गुर्वीमुपकृतिं मत्वा ह्यवतारान दशाग्रहीत॥[१]
{[१] जनार्दनभगवान ने परोपकार और मोक्ष को लेकर तराजू में तौला। इससे परोपकार पलड़ा भारी जानकर ही उन्होंने परोपकार करने के निमित्त (अजन्मा होकर भी) दस अवतार धारण किये।}
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साधारण मनष्य जिन कामों को करते हैं, उन्हीं को महापुरुष भी किया करते हैं। किन्तु साधारण लोगों के कार्य अपने सुख के लिये होते हैं और महापुरुषों के काम समस्त जीवों के कल्याण के निमित्त होते हैं। महात्मा तो स्वयं तीर्थस्वरूप हैं, उन्हें तीर्थ यात्रा की आवश्यकता ही क्या?
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उन्हें न तो स्वर्ग की ही इच्छा है और न पवित्र होने की। करोड़ों स्वर्ग उनके संकल्प से उत्पन्न हो सकते हैं और जगत की पवित्र करने की शक्ति उनमें स्वयं ही मौजूद है। ऐसी स्थिति में उनका तीर्थ भ्रमण केवल मात्र परोपकार और जीवों के उद्धार के ही निमित्त होता है, इसीलिये महाप्रभु श्रीनीलाचल को छोड़कर सुदूर दक्षिणप्रान्त के तीर्थों में भ्रमण करते रहे।
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वे जहाँ भी पधारे, वही तीर्थ धन्य हो गये और वहाँ के नर नारी कृतकृत्य हो गये। चातुर्मास्य बिताकर महाप्रभु वेंकट भट्ट से विदा लेकर श्रीरंगम होते हुए ॠषभ पर्वत पर गये। वहाँ पर उन्होंने सुना कि स्वामी परमानन्दपुरी महाराज यहीं ठहरे हुए हैं।
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इस संवाद को सुनकर प्रभु पुरी महाराज के दर्शनों के लिये उनके निवास स्थान पर गये और वहाँ जाकर उनकी चरण वन्दना की। पुरी महाराज ने प्रभु को प्रेमपूर्वक आलिंगन किया और तीन दिन तक दोनों साथ ही रहकर कृष्ण-कथा, कृष्ण कीर्तन करते रहे। पुरीमहाराज ने कहा- ‘मेरी इच्छा है कि मैं श्रीपुरुषोत्तम भगवान के दर्शन करके गंगा स्नान के निमित्त नवद्वीप जाऊँ।’
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महाप्रभु जी ने कहा- ‘आप तब तक चलें, नवद्वीप से लौटकर आप फिर पुरी ही आवें। मैं भी सेतुबन्ध रामेश्वर के दर्शन करता हुआ शीघ्र ही पुरी आने का विचार कर रहा हूँ, यदि भगवत कृपा हुई तो हम दोनों साथ ही साथ नीलाचल में रहेंगे।’ यह कहकर प्रभु तो सेतुबन्ध रामेश्वर की ओर चले और पुरीमहाराज ने जगन्नाथपुरी का रास्ता पकड़ा।
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महाप्रभु ने अनेक वन, पर्वत और ग्रामों में होते हुए शैलपर्वत पर पहुँचे। वहाँ ब्राह्मण-ब्राह्मणी का वेष धारण किये हुए शिव पार्वती का प्रभु ने आतिथ्य ग्रहण किया, वहाँ से कामकोष्ठीपुरी होते हुए वे दक्षिण मथुरा पहुँचे।
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वहाँ पर एक ब्राह्मण ने प्रभु को निमन्त्रित किया। वह ब्राह्मण प्रतिक्षण रोता रोता ‘सीताराम, सीताराम’ रटता रहता था। प्रभु ने उसका निमंत्रण सहर्ष स्वीकार किया। और मध्याह्न-स्नान करके उसके घर भिक्षा करने पहुँचे। महाप्रभु ने जाकर देखा, उसने कुछ भी भोजन नहीं बनाया है। उदासभाव से चुपचाप बैठा है।
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महाप्रभु ने हँसकर कहा- ‘विप्रवर ! आपने अभी तक भोजन क्यों नहीं बनाया है?’ अत्यन्त ही सरलता के साथ ब्राह्मण ने कहा- ‘प्रभो ! यहाँ अयोध्यापुरी की तरह वैभव थोड़ा ही है, जो दास दासी सब काम क्षणभर में कर दें। यहाँ तो अरण्यवास है, लक्ष्मण जी जंगलों से फल-फूलों लावेंगे, तब कहीं सीतामाता रन्धन करेंगी, तब मेरे सरकार प्रसाद पावेंगे।’
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महाप्रभु उस भक्त ब्राह्मण के ऐसे विशुद्ध भाव को देखकर अत्यन्त ही प्रसन्न हुए और उसकी भूरि भूरि प्रशंसा करते हुए प्रेम में उन्मत्त होकर नृत्य करने लगे। अब वह ब्राह्मण उठा और अस्त-व्यस्त भाव से भोजन बनाने लगा। तीसरे पहर जाकर कहीं भोजन बना। उसने बड़ी श्रद्धा-भक्ति के सहित प्रभु को भिक्षा करायी। प्रभु को भिक्षा कराकर वह निराहार ही बना रहा। उसने कुछ भी प्रसाद नहीं पाया।
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तब प्रभु ने पूछा- ‘विप्रवर ! आपने प्रसाद नहीं पाया, यह क्या बात है? आप इतने दुखी क्यों है? अपने दुख का मुझे ठीक ठीक कारण बताइये ?’ उस ब्राह्मण ने रोते रोते कहा- ‘प्रभो ! जगज्जननी सीतामाता को दुष्ट रावण अपने पापी हाथों से पकड़ ले गया। उस दुष्ट राक्षस ने माता का स्पर्श किया, इससे बढ़कर मेरे लिये और दु:ख हो ही क्या सकता है, मैं अब जीवन धारण न करूँगा। जब मुझे यह बात स्मरण होती है तभी मेरा कलेजा फटने लगता है।’
(क्रमशः)

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