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*दादू राम रसाइन नित चवै, हरि है हीरा साथ ।*
*सो धन मेरे साइयां, अलख खजाना हाथ ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*६९. भक्तों के साथ प्रेम-रसास्वादन*
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आचार्य के पूजा-गृह में जाकर प्रभु ने भगवान के लिये साष्टांग प्रणाम किया। उसी समय आचार्य प्रभु के चरणों में लोट गये। आचार्य के चरणों में हरिदास जी लोटे। इस प्रकार आचार्य को अपने चरणों में देखकर प्रभु जल्दी से कानों पर हाथ रखते हुए उठे और अपने दाँतों से जीभ काटते हुए कहने लगे- ‘श्रीहरि, श्रीहरि ! आप यह हमारे ऊपर कैसा अपराध चढ़ा रहे हैं? हम तो आपके पुत्र के समान हैं।
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भोजन तैयार था, सभी ने साथ बैठकर बड़े ही प्रेम के साथ भोजन किया। रात्रिभर नित्यानंद जी के सहित प्रभु ने आचार्य के घर पर ही निवास किया। दूसरे दिन आप गंगा को पार करके उस पार कालना नामक स्थान में पहुँचे। वहाँ पर परम वैष्णव गौरीदास जी धरवार छोड़कर एकांत में गंगा जी के किनारे रहकर भजन-भाव करते थे।
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प्रभु विचित्र वेश से उनके पास पहुँचे। प्रभु के कंधे पर नाव खेने का एक डांड़ रखा हुआ था, वे मल्लाओं की तरह हिलते-हिलते गौरीदास जी के समीप पहुँचे। गौरीदास जी ने प्रभु की प्रशंसा तो बहुत दिनों से सुन रखी थी; किंतु उन्हें प्रभु के दर्शनों का सौभाग्य अभी तक नहीं प्राप्त हुआ था।
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प्रभु का परिचय पाकर उन्होंने इनकी पूजा की और अन्य सामग्रियों से उनका सत्कार किया। प्रभु ने उन्हें वह डाँड़ देते हुए कहा- ‘आप इसके द्वारा संसार सागर में डूबे हुए लोगों का उद्धार कीजिये और उन्हें संसार सागर से पार उतारिये।’ उसे प्रभु की प्रसादी समझकर उन्होंने उसे सहर्ष स्वीकार किया। उनके परलोगमन के अनन्तर उस डाँड़ के अधिपति उनके पट्टशिष्य-श्रीहृदय चैतन्य महाराज हुए।
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उन्होंने उस डांड़ की बड़ी महिमा बढ़ायी उनके उत्तराधिकारी महात्मा श्री श्यामानंद जी ने तो सम्पूर्ण उड़ीसा प्रान्त में ही गौर-धर्म का बड़ा भारी प्रचार किया। सम्पूर्ण उड़ीसा-देश में जो आज गौर-धर्म का इतना अधिक प्रचार है, उसका सब श्रेय महात्मा श्यामानंद जी को ही है।
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उन्होंने लाखों उड़ीसा-प्रांत निवासियों को गौर-भक्त बनाकर उन्हें भगवन्नामोपदेश किया। सचमुच प्रभु-प्रदत्त वह डाँड़ लोगों को संसार सागर से पार उतारने का एक प्रधान कारण बन सका। कालना से चलकर प्रभु फिर नवद्वीप में ही आकर रहने लगे। आचार्य भी बीच-बीच में प्रभु के दर्शनों को नवद्वीप आते थे।
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इसी प्रकार एक दिन श्रीवास पण्डित अपने घर में पितृश्राद्ध करके पितरों की प्रसन्नता के निमित्त विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ कर रहे थे। उसी समय प्रभु वहाँ आ उपस्थित हुए। पाठ सुनते-सुनते ही प्रभु को वहाँ फिर नृसिंहावेश हो आया और वे नृसिंहवेश में आकर हुंकार देने लगे और चारों और इधर-उधर दौड़ने लगे।
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प्रभु की हुंकार और गर्जना को सुनकर सभी लोग भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे। लोगों को भयभीत देखकर श्रीवास पण्डित ने प्रभु से भाव-संवरण करने की प्रार्थना की। श्रीवास की प्रार्थना पर प्रभु मूर्च्छित होकर गिर पड़े और थोड़ी देर में प्रकृतिस्थ हो गये।
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एक बार वनमाली आचार्य नाम का एक कर्मकाण्डी की ब्राह्मण अपने पुत्र सहित प्रभु के पास आया और उनके पादपद्मों में प्रणाम करके उसने अपनी निष्कृति का उपाय पूछा। प्रभु ने उसके ऊपर कृपा प्रदर्शित करते कहा- ‘इस कलिकाल में कर्मकाण्ड की क्रियाओं का सांगोपांग होना बड़ा दुस्साध्य है। अन्य युगों की भाँति इस युग में द्रव्य-शुद्धि, शरीरशुद्धि बन ही नहीं सकती। इसलिये इस युग में तो बस, एकमात्र भगवन्नाम ही आधार है।’
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जैसा कि सभी शास्त्रों में बताया गया है- हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम् । कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा। प्रभु के उपदेशानुसार वह कर्मकाण्डी ब्राह्मण परम भागवत वैष्णव बन गया। एक दिन प्रभु विष्णु-मण्ड पर बैठकर बलदेव जी के आवेश में आकर ‘मधु लाओ, मधु लाओ’ इस प्रकार कहने लगे। नित्यानंद जी समझ गये कि प्रभु को बलदेव जी का आवेश हो आया है, इसलिये उन्होंने एक घड़ा गंगाजल लाकर प्रभु के सम्मुख रख दिया।
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जल पीकर प्रभु जोरों के साथ नृत्य करने लगे और जिस प्रकार बलदेव जी ने यमुनाकर्षण-लीला की थी, उसी का अभिनय करने लगे। उस समय वनमाली आचार्य को प्रभु के हाथ में सोने के हल और लांगल दिखायी देने लगे। चन्द्रशेखर आचार्य को प्रभु बलराम के रूप में दीखने लगे। इस प्रकार प्रभु अपने अन्तरंग भक्तों को भाँति-भाँति की अलौकिक और प्रेममय लीलाएँ दिखाने लगे।
(क्रमशः)

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