बुधवार, 22 अप्रैल 2020

*९१. श्रीगोपीनाथ क्षीरचोर*

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*को साधु जन उस देश का, आया इहि संसार ।*
*दादू उसको पूछिये, प्रीतम के समाचार ॥*
*दादू दत्त दरबार का, को साधु बांटै आइ ।*
*तहाँ राम रस पाइये, जहँ साधु तहँ जाइ ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*९१. श्रीगोपीनाथ क्षीरचोर*
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पुजारी के मुख से अपनी प्रशंसा सुनकर पुरी महाराज कुछ लज्जित हुए। वे भगवान की कृपालुता, भक्त वत्‍सलता और अपने भक्तों के प्रति अपार ममता के भावों को स्‍मरण करके प्रेम में विभोर होकर रुदन करने लगे। रोते-रोते उन्‍होंने भगवान का दिया हुआ वह महाप्रसाद दोनों हाथ फैलाकर अत्‍यन्‍त ही दीन-भाव से भिखारी की भाँति ग्रहण किया।
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एकान्‍त में प्रेम में पागल हुए उस महाप्रसाद को वे पाने लगे। उस समय के उनके अनिर्वचनीय आनन्‍द का अनुमान लगा ही कौन सकता है? एक तो भगवान का महाप्रसाद और दूसरे साक्षात भगवान ने अपने हाथ चोरी करके दिया। पुरी रोते जाते थे और उस प्रसाद को पाते जाते थे। चारों ओर से पात्र को खूब चाट-चाटकर पुरी ने प्रसाद पाया।
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फिर जल डालकर उसे धोकर पी गये और उस मिटटी के पात्र के टूकड़े कर करके उन्‍हें अपने वस्‍त्र में बाँध लिया। भला, भगवान के दिये हुए पात्र को वे फेंक कैसे सकते थे? उस को रोज नियम से एक-एक करके खा लेते थे।
जब रेमुणाय के लोगों को भगवान की क्षीर-चोरी की बात मालूम पड़ी, तब तो हजारों नर-नारी पुरी महाराज के दर्शन के लिये आने लगे।
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चारों ओर पुरी महाराज के प्रभु प्रेम की प्रशंसा होने लगी। सभी के मुखों पर वही पुरी महाराज की अलौकिक भक्ति की बात थी, सभी उनके भगवत प्रेम की भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे। प्रतिष्‍ठा को शूकरीविष्‍ठा और गौरव को रौरव-नरक के समान दु:खदायी समझनेवाले पुरी महाराज अब अधिक काल तक वहाँ न ठहर सके, वे श्रीगोपीनाथ भगवान क चरणों की वन्‍दना करके जगन्‍नाथ पुरी के लिये चले गये।
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जगन्‍नाथ जी में पहुँचते ही पुरी महाराज के आगमन का समाचार चारों ओर फैल गया। दूर-दूर से लोग पुरी महाराज के दर्शन के लिये आने लगे। सचमुच मान-प्रतिष्‍ठा तथा कीर्ति की गति अपनी शरीर की छाया के समान ही है, तुम यदि स्वयं छाया को पड़ने दौड़ोगें तो वह तुमसे आगे-ही-आगे भगती जायगी। तुम कितना भी प्रयत्‍न करो, वह तुम्‍हारे हाथ न आवेगी।
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उसी की तुम उपेक्षा करके उससे पीछा छुड़ाकर दूसरी ओर भागो, तुम चाहे उससे कितना भी पीछा छुड़ाना चाहो, किंतु वह तुम्‍हारा पीछा न छोड़ेगी। तुम जिधर भी जाओगे उधर ही वह तुम्‍हारे पीछे-पीछे लगी डोलेगी। जो लोग प्रतिष्‍ठा चाहते हैं, प्रतिष्‍ठा के लिये सब कुछ करने को तैयार हैं, उनकी प्रतिष्‍ठा नहीं होती और जो संसार में पृथक होकर एकदम प्रतिष्‍ठा से दूर भागते हैं, संसार उनकी प्रतिष्‍ठा करता है। इसीलिये तो संसार की गति को उलटी बताते हैं।
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गोपीनाथ भगवान के दरबार में से पुरी महाराज प्रतिष्‍ठा के ही भय से भाग आये थे, उसने यहाँ भी पिण्‍ड नहीं छोड़ा। अस्‍तु, कुछ काल तक जगन्‍नाथपुरी में निवास करके ब्राह्मणों के समुख अपने श्रीगोपाल की इच्‍छा कह सुनायी। भगवान की इच्‍छा को समझकर पुरीनिवासी ब्राह्मण परम प्रसन्‍न हुए और उन्‍होंने पुरी महाराज के लिये बहुत-से मलयागिरी चन्‍दन की व्‍यवस्‍था कर दी।
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राजा से कहकर उन्‍होंने चन्‍दन के लिये यथेष्‍ट कर्पूर तथा केसर-कस्‍तूरी का भी प्रबन्‍ध कर दिया। उन्‍हें व्रज तक पहुँचाने के लिये दो सेवक भी पुरी महाराज के साथ कर दिये और राजाज्ञा दिलाकर उन्‍हें प्रेमपूर्वक विदा कर दिया। चन्‍दन, कर्पूर आदि को लिये हुए पुरी महाराज फिर रेमुणाय में पधारे और श्रीगोपीनाथ भगवान के दर्शन के निमित वहाँ दो चार दिन के लिये ठहर गये।
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भगवान तो भाव के भूखे हैं, उन्‍हें किसी संसारी भोग की वांछा नहीं, वे तो भक्त का भक्ति-भाव ही देखना चाहते हैं। पुरी महाराज की अलौकिक श्रद्धा तो देखिये, भगवान की आज्ञा पाते ही चन्‍दन लेने के लिये भारत के एक छोर से समुद्र के किनारे दूसरे छोर पर आपत्ति-विपत्तियों की कुछ भी परवा न करते हुए प्रेम सहित चल दिये।
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अब भक्त की अग्नि-परीक्षा हो चुकी। वे उसमें खरे सोने के समान निर्मल होकर चमकते हुए ज्‍यों-के-त्‍यों ही निकल आये। अब भगवान ने भक्त को और अधिक क्‍लेश में डालना उचित नहीं समझा। उस समय मुसलमानी शासन में इतनी दूर तक चन्‍दन आदि को ले जाना बड़ा कठिन था। फिर स्‍थान-स्‍थान पर घोर युद्ध हो रहे थे, कहीं भी निर्विघ्‍न पथ नहीं था।
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इसीलिये भगवान ने पुरी महाराज को स्‍वप्‍न में आज्ञा दी- ‘श्री गोपीनाथ और मैं एक ही हूँ। तुम हमारे दोनों विग्रहों में किसी प्रकार की भेद-बुद्धि मत रखो। तुम इस चन्‍दन का लेप श्रीगोपीनाथ के ही विग्रह में करो। इसी से हमारा ताप दूर हो जायगा। हमारे वचनों पर विश्‍वास करके तुम नि:संकोच-भाव से इस चन्‍दन को यहीं पर घिसवाकर हमारे अभिन्‍न विग्रह में लगवा दो।’
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पुरी महाराज को पहले जो स्‍वप्‍न में आदेश हुआ था, उसकी पूर्ति के लिये तो वे जगन्‍नाथ जी चन्‍दन लेने के लिये दौड़े आये थे, अब जो भगवान ने स्‍वप्‍न में आज्ञा दी उसे वे कैसे टाल सकते थे, इसीलिये भगवान की आज्ञा शिरोधार्य करके वे वहीं ठहर गये और चन्‍दन घिसवाने के लिये दो आदमी नौकर और रख लिये।
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ग्रीष्‍मकाल के चार महीनों तक वहीं रहकर पुरी महाराज भगवान के अंग पर कर्पूर, चन्‍दन आदि का लेप कराते रहे और जब भगवान का ताप दूर हो गया, तो वे चतुर्मास बिताने के लिये निमित्त पुरी चले गये और वहाँ चार महीने निवास करके फिर अपने श्रीगोपाल के समीप लौट आये।
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इस प्रकार सभी भक्‍तों को श्रीमन्‍माधवेन्‍द्रपुरी को उत्‍कट और अलौकिक प्रेम की कहानी कहते-कहते प्रभु का गला भर आया। प्रभु के दोनों नेत्रों से अश्रुधारा निकल-निकलकर उनके वक्ष:स्‍थल को भिगोने लगी। पुरी के महात्‍म्‍य का वर्णन करते-करते अन्‍त में उन्‍हें उस श्‍लोक का स्‍मरण हो आया जिसे पढ़ते-पढ़ते पुरी महाराज ने इस पांच भौतिक शरीर का परित्‍याग किया था।
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वे रुँधे हुए कण्‍ठ से उस श्‍लोक को बार-बार पढ़ने लगे-श्‍लोक पढ़ते-पढ़ते वे बेहोश होकर नित्‍यानन्‍द जी की गोद में गिर पड़े। अन्‍य उपस्थित भक्त भी प्रभु को रुदन करते देखकर जोरों से क्रन्‍दन करने लगे। उसी समय भगवान का भोग लगाकर शयन-आरती हुई। प्रभु ने सभी भक्‍तों के सहित शयन-आरती के दर्शन किये और फि‍र वहीं मन्दिर के समीप ही एक स्‍थान में रात्रि बिताने का निश्‍चय किया।
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पुजारियो ने लाकर भगवान के क्षीर-भोग के बारह पात्र प्रभु के सामने रख दिये। प्रभु भगवान के उस महाप्रसाद के दर्शनमात्र से ही परम प्रसन्‍न हो उठे। प्रसन्‍नता प्रकट करते हुए उन्‍होंने कहा- आज हमारा जन्‍म सफल हआ, जो हम गोपीनाथ भगवान के क्षीर के अधिकारी समझे गये। भगवान के प्रसाद के सम्‍बन्‍ध में लोभवृति करना ठीक नहीं है।
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हम पाँच ही आदमी हैं, अत: आप हमें पांच पात्र देकर सात पात्रों को उठा ले जाइये। भगवान के प्रसाद के अधिकारी सभी हैं। उसे अकेले-ही-अकेले पा लेना ठीक नहीं है। यह कहकर प्रभु ने पाँच पात्रों को ग्रहण करके शेष सात पात्रों को लौटा दिया। भगवान के उस अदभुत महाप्रसाद ने प्रभु ने अपने भक्तों के साथ श्रद्धासहित पाया और वह रात्रि वहीं भगवान के चरणों के समीप बितायी।
(क्रमशः)

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