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*पंडित श्री जगजीवनदास जी की अनभै वाणी*
*श्रद्धेय श्री महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Premsakhi Goswami*
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*४. विरह कौ अंग ~ १२१/१२४*
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कहि जगजीवन मस्त मन, गहिला बहिरा गूंग ।
आसिक नूरी नूर की, भरि करि बांधी चूंग३ ॥१२१॥
(३. चूंग-गठड़ी)
संत जगजीवन जी कहते है कि प्रभु में लगा जीव संसार के लिए पागल बहरा व गूंगा होता है, वह तो अपने परमात्मा के तेज की प्रभा की ही गठरियाँ पाकर आनंदित है उसे वह ही भरपूर मिला है।
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रोया चाहिये रैन दिन, मूरख हँसे गँवार ।
कहि जगजीवन रांम रस, भिदै न सरस सुमार ॥१२२॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु प्रेम की पीड़ा व वेदना ही जीव में हो वह ही भक्ति की पहचान है हंसी तो मूरख करते हैं। संत कहते हैं कि राम रस यानि परमात्मा का आनंद सरस में शामिल नहीं है यानि वह भौतिक आनंद में नहीं है।
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दरदबंद है देह तजि, घायल है घटि सोधि ।
कहि जगजीवन मांहि मर, प्रांणि मन परमोधि१ ॥१२३॥
(१. परमोधि-प्रमोद-हर्ष या ज्ञान)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जिसे विरह है वह तो सोचता है कि देह छूटे तो प्रभु से मिले, और जो जन विरह से घायल हैं वे मन में ही प्रभु को ढूंढते हैं। और जिन्होंने अपने आपको मिटा दिया है वे उस से मिल कर आनंदित हैं क्योंकि जहाँ आपा मिटता है वहां प्रभु मिलते हैं।
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रांम रिदै एकादसी, रोजा ए ब्रत मास ।
आसिक अलख अलह लहै, सु कहि जगजीवनदास ॥१२४॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि राम को पाने के लिये कोइ एकादशी व्रत करे कोइ महीने भर रोजे का व्रत करें तब भी उन्हें प्रभु नहीं मिलते वे तो सच्चे पूजक को ही मिलते हैं, जो हद से भी ज्यादा उन्हें चाहते हैं उनके दिवाने हैं।
(क्रमशः)

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