सोमवार, 6 अप्रैल 2020

*७१. नदिया में प्रेम-प्रवाह और क़ाज़ी का अत्‍याचार*

🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*रंग लागो रे राम को, सो रंग कदे न जाई रे ।*
*हरि रंग मेरो मन रंग्यो, और न रंग सुहाई रे ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. ४१४)
=================
साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
.
*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
.
*७१. नदिया में प्रेम-प्रवाह और क़ाज़ी का अत्‍याचार*
.
नामैकं यस्‍य वाचि स्‍मरणपथगतं श्रोत्रमूलं गतं वा
शुद्ध वाशुद्धवर्ण व्‍यवहितिसहितं तारमत्‍येव सत्‍यम्।
तच्‍चेद्देहद्रविणजनतालोभपाखण्‍डमध्‍ये
निक्षिप्‍तं स्‍यान्‍न फलजनकं शीघ्रमेवात्र विप्र॥[१]
([१] जिसकी जिह्वा से एक बार भगवान के मधुर नाम का उच्चारण हो गया है या स्मरण के द्वारा हृदय में स्फुरित हो गया है अथवा कान से सुन ही लिया है, फिर चाहे उस नाम का उच्चारण शुद्ध हुआ हो या अशुद्ध अथवा व्यवधान सहित हो तो भी उस नाम के उच्चारण, स्मरण अ‍थवा श्रवण से मनुष्‍य अवश्‍य ही तर जाता है। किन्तु उस नाम का व्यवहार शुद्ध भावना से होना चाहिये। यदि शरीर, धन, स्त्री, लोभ अथवा पाखण्‍ड के लिये नाम का आश्रय लिया जायगा तो (नाम लेना व्यर्थ तो जायगा नहीं, उससे फल तो अवश्‍य ही होगा; किंतु) वह शीघ्र फल देने वाला न हो सकेगा ~ पद्मपुराण)
.
प्रेम ही ‘जीवन’ है। जिस जीवन में प्रेम नहीं, वह जीवन नहीं जंजाल है। जहाँ प्रेम है, वही वास्‍तविक प्रेम की छटा दृष्टिगोचर होती है। कहीं प्रेमियों का सम्मिलन देखिये, प्रेमियों की वार्ता सुनिये अथवा प्रेमियों के हास-परिहास, खान-पान अथवा उनके मेलों-उत्‍सवों में सम्मिलित हूजिये, तब आपको पता चलेगा कि वास्‍तविक जीवन कैसा होता है और उसमे कितना मजा है, कितनी मिठास है। उस मिठास के सामने संसार के जितने मीठे कहे जाने वाले पदार्थ हैं, सभी फीके-फीके–से प्रतीत होने लगते हैं।
.
किसी भाग्‍यवान पुरुष के शरीर में ही प्रेम प्रकट होता है और उसकी छत्रछाया में जितने भी प्राणी आकर आश्रय ग्रहण करते हैं, वे सभी पावन बन जाते हैं, उन्‍हें भी वास्‍तविक जीवन का सुख मिल जाता है। प्रेमी जिस स्‍थान में निवास करता है, वह भूमि पावन बन जाती है, जिस स्‍थान में वह क्रीड़ा करता है, वह स्‍थान तीर्थ बन जाता है, और जिन पुरुषों के साथ वह लीला करता है, वे बड़भागी पुरुष भी सदा के लिये अमर बन जाते हैं।
.
जिस नवद्वीप में प्रेमवतार गौरचन्‍द्र उदित होकर अपनी सुखद शीतल किरणों के प्रकाश से संसारी तापों से आक्‍लांत प्राणियों को शीतलता प्रदान कर रहे हों उस भाग्‍यवती नगरी के उस समय के आनन्‍द का वणन कर ही कौन सकता है? महाप्रभु के कीर्तनारम्‍भ से सम्‍पूर्ण नवद्वीप एक प्रकार से आनन्‍द का घर ही बन गया था।
.
वहाँ हर समय श्रीकृष्‍ण-कीर्तन की सुमधुर ध्‍वनि सुनायी पड़ती थी। जगाई-मधाई के उद्धार से लोग संकीर्तन का महत्त्व समझने लगे। हजारों लोग सदा प्रभु के दशर्नों के लिये आते। वे प्रभु के लिये भाँति-भाँति की भेंटे लाते। कोई तो सुंदर पुष्‍पों की मालाएँ लाकर प्रभु के गले में पहनाता, कोई स्‍वादिष्‍ट फलों को ही उपहारस्‍वरूप प्रभु के सामने रखता।
.
बहुत-से सुंदर-सुंदर पकवान अपने घरों से लाकर प्रभु को भेंट करते। प्रभु उनमें से थोड़ा-सा लेकर सभी के मन को प्रसन्‍न कर देते। सभी आकर पूछते- प्रभो ! हमलोग भी कुछ कर सकते हैं? क्‍या हमलोगों को भी कृष्‍ण कीर्तन का अधिकार है?’
.
प्रभु कहते- ‘कृष्‍ण-कीर्तन सब कोई कर सकता है। इसमें तो अधिकार-अनधिकारी का प्रश्‍न ही नहीं। भगवन्‍नाम के तो सभी अधिकारी हैं। नाम में विधि-निषेध अथवा ऊँच-नीच का विचार ही नहीं। आपलोग प्रेम-पूर्वक श्रीकृष्‍ण-कीर्तन कर सकते हैं।‘ इस पर लोग पूछते- ‘प्रभो ! हमलोग तो जानते भी नहीं, कीर्तन कैसे किया जाता है। हमें आजतक संकीर्तन की शिक्षा ही नहीं मिली और न हमने इसकी पद्धति किसी पुस्‍तक में ही पढ़ी।
.
प्रभु हंसकर कहने लगते- ‘नाम-संकीर्तन में सीखना ही क्‍या है, यह तो बड़ा सरल मार्ग है। इसके लिये विज्ञता अथवा बहुज्ञता की आवश्‍यकता नहीं। सभी कोई इसे कर सकते हैं। देखो, इस प्रकार ताली बजाकर-
हरि हरये नम: कृष्‍ण यादवाय नम:।
गोपाल गोविन्द राम श्रीमधुसूदन॥
.
इस मन्त्र को या और किसी मन्त्र को जिसमें भगवान के नामों का ही कीर्तन हो, गाते गये, दस-पांच अपने साथी इकट्ठे कर लिये और सभी मिलकर नाम-संकीर्तन करने लगे। तुम लोग नियमपूर्वक महीने भर तक करो तो सही, फिर देखना कितना आनन्द आता है।’
.
लोग प्रभु के मुख से भगवन्नाम-माहात्म्य और कीर्तन की महिमा सुनते और वहीं उन्हें दिखा-दिखाकर संकीर्तन करने लगते। जहाँ वे भूल करते प्रभु उन्हें फौरन बता देते। इस प्रकार उनसे जो भी पूछने आते, उन सभी को भगवन्नाम संकीर्तन का ही उपदेश करते।
.
लोग महाप्रभु की आज्ञा शिरोधार्य करके अपने-अपने घरों को चले आते और दूसरे ही दिन से संकीर्तन आरम्भ कर देते। पहले तो लोग ताली बजा-बजाकर ही कीर्तन करते थे, किंतु ज्यों-ज्यों उन्हें आनन्द आने लगा, त्यों-ही-त्यों उनके संकीर्तन के साथ ढोल-करताल तथा झाँझ-मृदंग आदि वाद्यों का ही समावेश होने लगा।
.
एक को कीर्तन करते देखकर दूसरे को भी उत्साह होने लगा और उसने भी दस-पांच लोगों को इकट्ठा करके अपनी एक छोटी संकीर्तन-मण्‍डली बना ली और दोनों समय नियम से संकीर्तन करने लगे। इस प्रकार प्रत्येक मुहल्ले में बहुत-सी संकीर्तन मण्‍डलियां स्थापित हो गयीं।
.
अच्छे-अच्छे घरों के लोग संध्‍या-समय अपने सभी परिवार वालों को साथ लेकर संकीर्तन करते। जिसमें स्त्री-पुरुष, छोटे-बडे़ सभी सम्मिलित होते। भक्त सदा आनन्द में छके-से रहते। परस्पर एक-दूसरे का आलिंगन करते।
.
दो भक्त जहाँ भी रास्ते में मिलते, वहीं एक-दूसरेसे लिपट जाते। कोई दूसरे को साष्‍टांग प्रणाम ही करते, वह जल्दी से उनकी चरण-रज लेने को दौड़ता। कभी दस-बीस भक्त मिलकर संकीर्तन के पदों का ही गायन करने लगे। कोई बाजार में सबके सामने नृत्य करते ही निकलते।
.
इस प्रकार भक्तिरूपी नदिया में सदा प्रेम की तरंगें ही उठती रहतीं। रात्रि-दिन शंख, घड़ियाल, तुरही, ढोल, करताल, झांझ, मृदंग तथा अन्यान्य प्रकार के वाद्यों से सम्पूर्ण नवद्वीप नगर गूंजता ही रहता। महाप्रभु भक्तों को साथ लेकर रात्रिभर संकीर्तन ही करते रहते। प्रात:काल घंटे-दो-घंटे के लिये सोते। उठते ही भक्तों को साथ लेकर गंगा-स्नान करने के लिये चले जाते।
.
भक्तों को तो लोगों ने सदा से ही ‘बावले’ की उपाधि दे रखी है। इन बावले भक्तों का स्नान भी विचित्र प्रकार का होता। ये लोग सदा अफीमची की तरह पिनक में ही बने रहते। मद्यप के समान नशे में ही झूमते रहते और पागलों के समान ही बड़बड़ाया करते।
.
स्नान करते-करते किसी ने किसी की धोती ही फेंक दी है, तो कोई किसी के ऊपर जल ही उलीच रहा है। कोई तैर कर उस पार जा रहा है, तो कोई प्रवाह के विरुद्ध ही तैरने का दुस्साहस कर रहा है। इस प्रकार घंटों में इनका स्नान समाप्त होता। तब प्रभु सब भक्तों के सहित घर आते।
.
देवपूजन, तुलसीपूजन आदि कर्मों को करते। तब तक विष्‍णुप्रिया भोजन बनाकर तैयार कर लेतीं। जल्दी से आप भोजनों पर बैठ जाते। भक्तों के बिना साथ लिये इन्हें भोजन अच्छा ही नहीं लगता था, इसलिये दस-पांच भक्त सदा इनके साथ ही भोजन करते।
.
भोजन करते-करते कभी तो माता से कहते- ‘अम्मा ! तेरी बहू के हाथ में जाने क्या जादू है।’ सभी चीजों में बड़ी भारी मिठास आ जाती है। और तो और, साग भी तो मीठा लगता है।’ पास बैठे हुए भक्त से कहने लगते- ‘क्यों जी ! ठीक है न? तुम्हें साग में भी मिठास मालूम पड़ती है!’ यह सुनकर सभी भक्त हंसने लगते।
.
विष्‍णुप्रिया जी भी मन-ही-मन मुसकराने लगतीं। भोजन के अनन्तर आप थोड़ी देर विश्राम करते। तीसरे पहर फिर धीरे-धीरे सभी भक्त प्रभु के घर आकर एकत्रित हो जाते। तब प्रभु उनके साथ श्रीकृष्‍ण-‍कथाएँ कहने लगते। कभी कोई श्रीमद्भागवत का ही प्रकरण छिड़ गया है। कभी कोई ‘गीत-गोविन्द’ के पद की ही व्याख्‍या कर रहा है।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें