सोमवार, 6 अप्रैल 2020

*७१. नदिया में प्रेम-प्रवाह और क़ाज़ी का अत्‍याचार*

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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*कहत सुनत तेरो कछू न जावै,*
*पापनि छेदन सोई लहो रे ।*
*दादू रे जन हरि गुण गावो,*
*कालहि जालहि फेरि दहो रे ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. ३)
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*७१. नदिया में प्रेम-प्रवाह और क़ाज़ी का अत्‍याचार*
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सांयकाल के समय भक्तों को साथ लेकर प्रभु नगर-भ्रमण करने के लिये निकलते। इस प्रकार इनका सभी समय भक्तों के सहवास में ही व्यतीत होता। क्षणभर भी भक्तों का पृथक् होना इन्हें असह्य-सा प्रतीत होता। भक्तों की भी प्रभु के चरणों में अहैतु की भक्ति थी।
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वे प्रभु के संकेत के अनुसार चेष्‍टाएँ करते। वे सदा प्रभु के मुख की ही ओर देखते रहते कि किस समय प्रभु के मुख पर कैसे भावों के लक्षण प्रतीत होते हैं। उन्हीं भावों के अनुसार वे क्रियाएँ करने लगते। इस कारण ईर्ष्‍या करना ही जिनका स्वभाव है, जो दूसरे के अभ्‍युदय तथा गौरव को देख ही नहीं सकते, ऐसे खल पुरुष सदा प्रभु की निन्दा किया करते। प्रभु उन लोगों की बातों के ऊपर ध्‍यान ही नहीं देते थे।
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जब कोई भक्त किसी के सम्बन्ध की ऐसी बातें छेड़ भी देता तो आप उसी समय उसे डांटकर कह देते -
*‘अन्यस्य दोषगुणचिन्तनमाशु त्यक्त्वासेवाकथारसमहो नितरां पिब त्वम्’*
दूसरोंकी निन्दा-स्तुति करना छोड़कर तुम निरन्तर श्रीकृष्‍ण-कीर्तन में ही अपने मन को क्यों नहीं लगाते। इस कारण प्रभु के सम्मुख किसी की निन्दा-स्तुति करने की भक्तों को हिम्मत ही नहीं होती थी।
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प्रभु के बढ़ते हुए प्रभाव को देखकर द्वेषी लोगों ने मुसलमानों को भड़काया। वे जानते थे कि हम निमाई पण्डित का वैसे तो कुछ बिगाड़ नहीं सकते। उनके कहने में हजारों आदमी हैं। हाँ, यदि शासकों की ओर से इन्हें पीड़ा पहुँचायी जायगी, तब तो इनका सभी गौरहरिपना ठीक हो जायगा।
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उस समय मुसलमानों का शासन था। इसलिये मुसलमानों की शिकायतों पर विशेष ध्‍यान दिया जाता था। इसलिये खलों ने मुसलमानों को ही बहकाना शुरू किया- ‘निमाई पण्डित अशास्त्रीय काम करता है। उसकी देखा-देखी सम्पूर्ण नगर में कीर्तन होने लगा है। दिन-रात्रि कीर्तन की ही ध्‍वनि सुनायी पड़ती है। इस कोलाहल के कारण रात्रि में लोगों को निद्रा भी तो नहीं आने पाती।
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क़ाज़ी से कहकर इन लोगों को दण्‍ड दिलाना चाहिये। न जाने ये सब मिलकर क्या कर बैठें?’ मुसलमानों को भी यह बात जँच गयी। वे भला हिंदु धर्म का अभ्‍युदय कब देख सकते थे ! इसलिये सभी ने मिलकर क़ाज़ी के यहाँ संकीर्तनके विरुद्ध अभियोग चलाया। उस समय बंगाल-सूबे में अभियोगों के निर्णय करने का काम काजियों के ही अधीन था।
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जमींदार, राजा अथवा मण्‍डलेश्‍वर कुछ गांवों का बादशाह से नियत समय के लिये ठेका ले लेते और जितने में ठेका लेते उतने रूपये तो कर उगाहकर बादशाह को दे देते, जो बचते उसे अपने पास रख लेते। दीवानी और फौजदारी के जितने मामले होते उनका फैसला क़ाज़ी किया करते। बादशाह की ओर से स्थान-स्थान पर क़ाज़ी नियुक्त थे।
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उस समय बंगाल के नवाब हुसेनशाह थे। वे बंगाल के स्वतन्त्र शासक थे। उनकी ओर से फौजदार चाँदखाँ नाम के क़ाज़ी नवद्वीप में भी नियुक्त हुए थे। बादशाह के दरबार में इनका बड़ा सम्मान था। कुछ लोगों का कहना है, ये हुसेनशाह के विद्यागुरु थे। कुछ भी हो, चाँदखाँ सहृदय, समझदार और शान्तिप्रिय मनुष्‍य थे। हिन्दुओं से वे अ‍कारण नहीं चिढ़ते थे।
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नीलाम्बर चक्रवर्ती के दौहित्र होने के नाते से वे महाप्रभु से भी परिचित थे। इसलिये लोगों के बार-बार शिकायत करने पर भी उन्होंने महाप्रभु के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं करनी चाही।
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जब लोगों ने नित्यप्रति उनसे संकीर्तन की शिकायत करनी आरम्भ कर दी और उन पर अत्यधिक जोर डाला गया तब उनकी भी समझ में यह बात आ गयी कि ‘हाँ, ये लोग दिन-रात्रि‍ बाजे बजा-बजाकर शोर मचाते रहते हैं। ऐसा भी क्या भजन-कीर्तन? यदि भजन ही करना है, तो धीरे-धीरे करें।
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यही सोचकर वे एक दिन अपने दल-बल के सहित कीर्तनवालों को रोकने के लिये चले। बहुत-से लोग प्रेम में उन्मत्त होकर संकीर्तन कर रहे थे। इनके आदमियों ने उनसे कीर्तन बंद कर देने के लिये कहा; किंतु वे भला किसी की सुनने वाले थे। मना करने पर भी वे बराबर कीर्तन करते ही रहे।
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इस पर क़ाज़ी को गुस्सा आ गया और उसने घुसकर कीर्तन करने वालों के ढोल फोड़ दिये और भक्तों से डांटकर कहने लगे- ‘खबरदार, आज से किसी ने इस तरह शोर मचाया तो सभी को जेल खाने भेज दूंगा।’ बेचारे भक्त डर गये। उन्होंने संकीर्तन बंद कर दिया। इसी प्रकार जहाँ-जहाँ भी सकीर्तन हो रहा था, क़ाज़ी के आदमी वहाँ-वहाँ जाकर संकीर्तन को बंद कराने लगे। सम्पूर्ण नगर में हाहाकर मच गया।
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लोग संकीर्तन के संबंध में भाँति-भाँति की बातें कहने लगे। कोई तो कहता- ‘भाई ! यहाँ मुसलमानी शासन में संकीर्तन हो ही नहीं सकता। हम तो इस देश को परित्‍याग करके किसी ऐसे देश में जाकर रहेंगे, जहाँ सुविधापूर्वक संकीर्तन कर सकेंगे।’ कोई कहते ‘अजी ! जोर-जोर से नाम लेने में ही क्‍या लाभ? यदि क़ाज़ी मना करता है, तो धीरे-धीरे ही नाम-जप कर लिया करेंगे। किसी प्रकार भगवन्‍नाम-जप होना चाहिये।’
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इस प्रकार भयभीत होकर लोग भाँति-भाँति की बातें कहने लगे। दूसरे दिन सभी मिलकर महाप्रभु के निकट आये और उन्‍होंने रात्रि में जो-जो घटनाएँ हुईं सब कह सुनायी और अंत में कहा- ‘प्रभो ! आप तो हमसे संकीर्तन करने के लिये कहते हैं, किंतु हमारे ऊपर संकीर्तन करने से ऐसी-ऐसी विपत्तियाँ आती हैं। अब हमारे लिये क्‍या आज्ञा होती है। आपकी आज्ञा हो तो हम इस देश को छोड़कर किसी ऐसे देश में चले जायँ, जहाँ सुविधापूर्वक संकीर्तन कर सकें। या आज्ञा हो तो संकीर्तन करना ही बंद कर दें। बहुत-से लोग तो डर के कारण भागे भी जा रहे हैं।’
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प्रभु ने कुछ दृढ़ता के साथ रोष में आकर कहा- ‘तुम लोगों को न तो देश का ही परित्‍याग करना होगा और संकीर्तन को ही बंद करना ! तुम लोग जैसे करते रहे हो, उसी तरह संकीर्तन करते रहो। मैं उस क़ाज़ी को और उसके साथियों को देख लूँगा, वे कैसे संकीर्तन को रोकते हैं? तुम लोग तनिक भी न घबड़ाओ।’
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प्रभु के ऐसे आश्‍वासन को सुनकर सभी भक्त अपने-अपने घरों को चले गये। बहुत-से तो प्रभु के आज्ञानुसार पूर्ववत ही संकीर्तन करते रहे। किंतु उनके मन में सदा डर ही बना रहता था। बहुतों ने उसी दिन से संकीर्तन करना बंद ही कर दिया। लोगों को डरा हुआ देखकर प्रभु ने सोचा कि इस प्रकार काम नहीं चलने का। लोग क़ाज़ी के डर से भयभीत हो गये हैं। जब तक मैं क़ाज़ी का दमन न करूँगा, तब तक लोगों का भय दूर न होगा।
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यह सुनकर पाठक आश्‍चर्य करेंगे कि क़ाज़ी के पास अस्‍त्र-शस्‍त्रों से सुसज्जित बहुत-सी सेना है, बादशाह की ओर उसे अधिकार प्राप्‍त है। उसके पास राजबल, धनबल, सैन्‍यबल तथा अधिकारबल आदि सभी मौजूद हैं। उसका दमन अहिंसाप्रिय, शांत स्‍वभाव वाले, अस्‍त्र-शस्‍त्रहीन, ढोल-करताल के लय के साथ नृत्‍य करने वाले निमाई पण्डित कैसे कर सकेंगे? इस प्रश्‍न का उत्तर पाठकों को अगले अध्‍याय में आप-से-आप ही मिल जायगा।
(क्रमशः)

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