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*दादू सुख सांई सौं, और सबै ही दुख ।*
*देखूँ दर्शन पीव का, तिस ही लागे सुख ॥*
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साभार ~ @Krishnakosh, http://hi.krishnakosh.org/
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*श्री श्रीचैतन्य-चरितावली ~ प्रभुदत्त ब्रह्मचारी*
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*८९. पुरी के पथ में*
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मा याहीत्यपमंगलं वज्र सखे स्नेहेन हीनं वच-
स्तिष्ठेति प्रभुता यथारुचि कुरुष्वैषाप्युदासीनता।
नो जीवामि विना त्वयेति वचनं सम्भाव्यते वा न वा
तन्मां शिक्षय नाथ यत्सुमुचितं वक्तुं त्वयि प्रस्थिते॥[१]
([१] अपने प्राणप्यारे के परदेश प्रयाण करते समय उसके वियोग से उतपन्न हुई वेदना को व्यक्त करती हुई नायिका पति से कह रही है, विदा के अन्तिम समय का वर्णन है। प्रियतम पूछते हैं - अच्छा, जाउं? उतर देती है - 'मत जाओ' इस अमंगलसूचक शब्द को यात्रा के शुभ मुहुर्त में कैसे मुख से निकालूं ? यह कहूँ कि 'अच्छा जाओ' तो यह स्नेहहीन शब्द है। यदि कहूँ 'रुक जाओ' तो इसमें प्रभुता प्रदर्शित होती है। और यह कह दूं कि 'जैसी आपकी इच्छा हो वैसा करें' तो इससे उदासीनता प्रकट होती है। यदि यह कह दूं कि 'तुम्हारे बिना मैं जीवित न रह सकूंगी' तो पता नहीं तुमको इस बात पर विश्वास हो अथवा न हो। इसीलिये मेरे प्राणनाथ ! तुम्हीं मुझे भिक्षा दो कि तुम्हारे प्रस्थान के समय क्या कहना उपयुक्त होगा, इस समय मैं किस वाक्य का प्रयोग करुं?)
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गोस्वामी तुलसीदास जी ने सज्जन और दुर्जन के समागम की तुलना करते हुए कहा है-
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं ।
मिलत एक दारुन दुख देहीं ॥
सचमुच अपने प्रियजन के बिछोह के समय तो सहृदय पुरुषों को मरण-समान ही दु:ख होता है।
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जिसके साथ इतने दिनों तक हास-परिहास, भोजन-पान आदि किया, जो निरन्तर अपने सहवास-सुख का आनन्द पहुँचाता रहा, वही अपना प्यारा प्रियतम आज सहसा हमसे न जाने कब तक के लिये पृथक हो रहा है, इस बात के स्मरण मात्र से सहृदय सज्जनों के हृदय में भारी क्षोभ उत्पन्न होने लगता है। किन्तु उस दु:ख में भी मीठा-मीठा मजा हैं, उसका आस्वादन भावुक प्रेमी पुरुष ही कर सकते हैं।
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संसारी स्वार्थपूर्ण पुरुषों के भाग्य में वह सुख नही बदा है। दस दिनों तक भक्तों के चित को आनन्दित कराते रहने के अनन्तर आज प्रभु शान्तिपुर को परित्याग करके पुरी के पथिक बन जायँगें, इस बात के स्मरण मात्र से सभी परिजन और पुरजनों के हृदय में प्रभु के वियोगजन्य दुख की पीड़ा-सी होने लगी। सभी के चेहरों पर विषण्णता छायी हुई थी।
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प्रभु ने कुछ अन्यमनस्क भाव से अपने ओढ़ने का रँगा वस्त्र उठाया, लंगोटी को कमर से बांध लिया और छोटी-सी साफी सिर से लपेट ली। एक हाथ में दण्ड लिया और दूसरे में कमण्डलु लेकर प्रभु उस बैठक से बाहर हुए । प्रभु को यात्री के वेष में देखकर उपस्थित सभी भक्त फूट-फूटकर रोने लगे। वृद्धा शची माता का तो दिल ही धड़कने लगा।
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जगदानन्द ने प्रभु के हाथ से दण्ड ले लिया और दामोदर पण्डित ने कमण्डलु। अब प्रभु के दोनों हाथ खाली हो गये। उन दोनों हाथों से वृद्धा माता के चरणों को स्पर्श करते हुए प्रभु ने गदगद कण्ठ से कहा - 'माता ! मुझे ऐसा आशीर्वाद दो कि मैं अपने सन्यांस-धर्म का विधिवत पालन कर सकूँ।' पता नहीं उस समय पुत्र स्नेह से दु:खी हुई माता को इतना साहस कहाँ से आ गया?
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उसने अपने प्यारे पुत्र के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा - बेटा ! तुम्हारा पथ मंगलमय हो, वायु तुम्हारे अनुकुल रहे, तुम अपने धर्म का विधिवत पालन कर सको।' इतना कहते-कहते ही माता का गला भर आया, आगे वह और कुछ न कह सकी। उसी अवस्था में रोती हुई अपनी माता की प्रभु ने प्रदक्षिणा की और दोनों हाथों को जोड़कर वे नि:स्पृहभाव से गंगा जी के किनारे-किनारे पुरी की ओर चल पड़े। सैकड़ों भक्त आंसू बहाते हुए और आर्तनाद करते हुए प्रभु के पीछे-पीछे चले।
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शचीमाता भी लोक-लाज की कुछ भी परवा न कर रोती हुई पैदल ही अपने प्राणप्यारे पुत्र के पीछे-पीछे चलीं। जिस प्रकार नि:स्पृह बछड़ा माता को छोड़कर पुरी के पथ में दूसरी ओर जा रहा हो और उसकी माता वृद्धा गाय रंभाती हुई उसके पीछे-पीछे दौड़ रही हो, इसी प्रकार शरीर की सुधि भुलाकर शची माता प्रभु के पीछे क्रन्दन करती हुई भक्तों के आगे-आगे चल रही थीं।
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उनके क्रन्दन से कलेजा फटने लगता था। उनके सफेद बाल बिखरे हुए थे, आँसुओं से वक्ष:स्थल भींगा हुआ था। वे पछाड़ खाती हुई प्रभु के पीछे-पीछे चल रही थीं। प्रभु माता को देखते हुए भी संकोचवश उनसे आँखे नहीं मिलाते थे। बूढ़े अद्वैताचार्य भी जोरों से बच्चों की भाँति रुदन कर रहे थे। इस प्रकार के रुदन को सुनकर प्रभु अधीर हो उठे।
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वे चलते-चलते ठहर गये और आँखों से आँसू बहाते हुए अद्वैताचार्य जी से कहने लगे - आचार्यदेव ! इतने वृद्ध होकर जब आप ही इस प्रकार बालकों की तरह रुदन कर रहे हैं तो फिर भक्तों को और कौन धैर्य बँधावेगा? आपका मुझ पर सदा पुत्र की भाँति स्नेह रहा है। यह मैं जानता हूँ कि मेरे वियोग से आपको अपार दु:ख हुआ है, किन्तु आप तो सर्वसमर्थ हैं।
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आपके साहस के सामने मेरा वियोगजन्य दु:ख कुछ भी नहीं है। आप अब मेरे कहने से शान्तिपुर लौट जायँ। आप यदि मेरे साथ चलेंगे तो यहाँ माता की तथा भक्तों की देख-रेख कौन करेगा। आप मेरे काम के लिये शान्तिपुर में रह जाइये। मैं माता को तथा भक्तों को आप के हाथ में सौंपता हूँ। आप ही सदा से इनके रक्षक रहे हैं और अब भी इन सबका भार आपके ही ऊपर है। यह करुणापूर्ण दृश्य अब और अधिक मुझसे नहीं देखा जाता। अब आप इन सभी भक्तों के सहित लौट जायँ।'
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आचार्य ने प्रभु की आज्ञा का पालन किया। वे वहीं ठहर गये। उन्होंने भूमि में लोटकर प्रभु के लिये प्रणाम किया। प्रभु ने उनकी चरण-धूली अपने मस्तक पर चढ़ायी और माता के चरणों की वन्दना करते हुए वे उन सबको पृथ्वी पर ही पड़ा छोड़कर जल्दी से आगे के लिये दौड़ गये।
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नित्यानन्द, दामोदर, जगदानन्द और मुकुन्ददत्त भी सभी लोगों से विदा होकर प्रभु के पीछे-पीछे दोड़ने लगे और सब लोग वहीं पड़े-के-पड़े ही रह गये। जब भक्तों ने देखा कि प्रभु तो हमें छोड़कर चले ही गये तब उन्होंने और अधिक प्रभु का पीछा नहीं किया। वे खड़े होकर गंगा जी की ओर देखते रहे।
(क्रमशः)

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